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सरसदास

By : अशर्फी लाल मिश्र

परिचय :
       सरसदास  हरिदासी सम्प्रदाय के भक्त कवि एवं  पंचम आचार्य थे। ये नागरीदास के छोटे भाई तथा बंगाल के राजा के मंत्री कमलापति के दूसरे पुत्र थे। इनका जन्म   वि ० सं ० १६११ में गौड़ ब्राह्मण कुल में हुआ था। ये स्वभाव  से विरक्त थे अतः अपने बड़े भाई नागरीदास के साथ ही वृन्दावन आ गए और बिहारिनदेव से दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के उपरान्त शेष जीवन वृन्दावन में ही व्यतीत हुआ। वि ०  सं ० १६७० में अपने बड़े भाई नागरीदास के परलोक-गमन के उपरान्त ये टट्टी संस्थान की गद्दी पर बैठे। वि ० सं ० १६८३ में इनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ :
इनके पद ,कवित्त और सवैये स्फुट रूप में उपलब्ध हैं। इनकी समस्त वाणी सिद्धांत के पद और श्रृंगार के पद दो   भागों में विभक्त है।

माधुर्य भक्ति :
           सरसदास के उपास्य श्यामा-श्याम आनंदनिधि ,सुखनिधि गुणनिधि और लावण्य-निधि हैं।  ये सदा   प्रेम में मत्त  में लीन  रहते हैं। राधा-कृष्ण के इसी  विहार का ध्यान सरसदास की उपासना है। किन्तु यह उपासना सभी को सुलभ नहीं है। स्वामी हरिदास जिस पर कृपा करें वही  प्राप्त कर सकता है।
           राधा-कृष्ण  विविध ल…

नागरीदास

By  : अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
नागरीदास हरिदासी सम्प्रदाय के चतुर्थ आचार्य भक्त कवि हैं। महन्त किशोरीदास के अनुसार आप का जन्म वि ० सं ० १६०० में हुआ। इसकी पुष्टि महन्त  किशोरी दास द्वारा निजमत सिद्धान्त के निम्न दिए उद्धरण  से होती है :

                           सम्वत सोरह सै तनु धाऱयो। महा शुक्ल पंचमी बिचारयो।। 
ये तत्कालीन बंगाल  राजा के मंत्री कमलापति के पुत्र थे। ऐसा  है कि इनके  पिता पुनः प्राण-दान देने के कारण बिहारिनदेव जी का अपने ऊपर बहुत ऋण मानते थे। उसी ऋण से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपने दो विरक्त  साधू  स्वभाव के पुत्रों को वृन्दावन  स्थित  श्री बिहारिनदेव की चरण-शरण में  भेज दिया। इन पुत्रों में बड़े नागरीदास और छोटे सरसदास थे।
          नागरीदास का सम्बन्ध गौड़ ब्राह्मण जाती से है किन्तु इनके जन्म स्थान आदि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इनके पिता बंगाल के राजा के मंत्री थे इस आधार पर इनका जन्म बंगाल माना जा सकता है। बिहारिनदेव का शिष्यत्व स्वीकार कर लेने पर शेष जीवन वृन्दावन में बीता। दीक्षा ग्रहण  समय इनकी आयु २२ वर्ष की थी और ४ ८  वर्ष  का समय…

बिहारिनदेव

By :अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
बिहारिनदेव हरिदासी सम्प्रदाय के श्रेष्ठ आचार्य एवं कवि  हैं। ये विट्ठलविपुलदेव के शिष्य थे। विहारिनदेव  अपने गुरु विट्ठलविपुलदेव की मृत्यु के पश्चात् टट्टी संस्थान की आचार्यगद्दी पर बैठे। विट्ठलविपुलदेव की मृत्यु वि ० सं ० १६३२ है अतः विहारिनदेव का जन्म संवत  इस संवत के आसपास माना  जा सकता है।
                 विहारिनदेव दिल्ली-निवासी थे। इनका जन्म शूरध्वज ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता मित्रसेन अकबर के राज्य-सम्बन्धी कार्यकर्ताओं में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। अपने शील-स्वभाव के कारण  मृत्यु के उपरान्त विहारिनदेव को भी अपने पिता का सम्मानित पद प्राप्त हो गया किन्तु ये स्वभाव से विरक्त थे ,अतः युवावस्था में ही घर छोड़ कर वृन्दावन  आ गये और वहीं भजन भाव में लीन  होकर रहने लगे। इनकी रस-नीति , विरक्ति और शील-स्वभाव का वर्णन केवल हरिदासी सम्प्रदाय के भक्त कवियों ने नहीं ,अपितु अन्य सम्प्रदाय  के भक्तों ने भी क्या है।
                विहारिनदेव का महत्व अपने सम्प्रदाय में अत्यधिक है। हरिदासी सम्प्रदाय के यही प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने संप्रदाय के उपासना स…

विट्ठलविपुल देव

By : अशर्फी लाल मिश्र

परिचय :
विट्ठलविपुल देव  की हरिदासी सम्प्रदाय में प्रमुख भक्त कवियों में गिनती की जाती है। ये  स्वामी हरिदास के मामा  के पुत्र थे। हरिदासी सम्प्रदाय के विद्वानों के अनुसार ये स्वामी हरिदास से आयु में कुछ बड़े थे और इनकी मृत्यु स्वामी जी की मृत्यु के एक वर्ष बाद हुई। इसलिए ये स्वामी जी के समकालीन  हैं। इनका निधन-काल वि ० सं ० १६३२ मन जा सकता है । इनका जन्म कहाँ हुआ यह निश्चित नहीं है लेकिन यह सर्वसम्मत है कि  स्वामी हरिदास के जन्म के बाद आप उनके पास राजपुर में ही रहते थे और स्वामी जी के विरक्त होकर वृन्दावन आ जाने पर आप भी वृन्दावन आ गये। आयु में बड़े होने पर भी स्वामी हरिदास का शिष्यत्व स्वीकार किया। ये बाल्यकाल से ही स्वामी जी से प्रभावित थे और उन्हें एक महापुरुष मानते थे। स्वामी जी  की मृत्यु के उपरान्त ये टट्टी संस्थान की गद्दी पर बैठे किन्तु स्वामी जी के वियोग की भावना इतनी प्रवल थी एक वर्ष बाद ही इनका परलोक गमन हो गया।

रचनाएँ :

 चालीस स्फुट  पद  एवं कवित्त माधुर्य भक्ति :
          विट्ठलविपुल देव के उपास्य श्यामा-श्याम परम रसिक हैं। ये नित्य -किशोर  सदा विहार मे…

स्वामी हरिदास : हरिदासी सम्प्रदाय के संस्थापक

चित्र
By : अशर्फी लाल मिश्र

स्वामी हरिदास 

जीवन परिचय :
हरिदासी सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी हरिदास की गणना ब्रज भाषा के प्रमुख भक्त कवियों में की  जाती है । उनकी भजन भावना और विरक्ति के विषय में कई समकालीन तथा परवर्ती कवियों ने उल्लेख किया है किन्तु इनके जन्म-संवत ,जन्म-स्थान ,जाति ,कुल, गुरु आदि का उल्लेख  किसी  भी समकालीन कवि या लेखक ने अपनी रचना में  नहीं किया। इसलिए आज इनके जन्म-संवत आदि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कहना  कठिन है.
            स्वामीजी के जन्म के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित हैं। पहले मत के पोषक हैं वृन्दावनस्थ  बांके  बिहारी  मंदिर के गोस्वामियों  के अनुसार  स्वामी जी वि ० सं ० १५६९ में अलीगढ जिले के अंतर्गत हरिदास नामक ग्राम में उत्पन्न हुए थे। इनके अनुसार स्वामीजी का जन्म गर्ग गोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण कुल में हुआ था। दूसरे मत के अनुसार स्वामी जी जन्म वि ० सं ० १५३७ में वृन्दावन  से १. ५  किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजपुर ग्राम के एक सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था।
            स्वामी हरिदास की मृत्यु ९५ वर्ष की अवस्था में हुई इससे दोनों मतों के विद्वान सहमत हैं। वि ० सं ०…

कवि / सेवक ( दामोदरदास )

By :  अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
            भक्त कवि सेवक जी का राधावल्लभ सम्प्रदाय में प्रमुख स्थान है। इनका जन्म श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में गौंडवाने के गढ़ा नामक ग्राम में हुआ था । यह गढ़ा ग्राम  जबलपुर  से ३  किलोमीटर दूर स्थित है। इनके जन्म-संवत तथा मृत्यु-संवत के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी पता नहीं है। किन्तु विद्वानों के अनुसार अनुमानतः इनका जन्म वि ० सं ० १५७७ तथा मृत्यु वि ० सं ० १६१० में हुई। (राधावल्लभ सम्प्रदाय :सिद्धांत और साहित्य :डा ० विजयेंद्र स्नातक :पृष्ठ ३४९ )         सेवक जी बचपन से ही भगवत अनुरागी जीव थे। अपने ही गाँव के एक सज्जन चतुर्भुजदास से इनकी परम मैत्री थी। एकबार वृन्दावन के कुछ रसिकों से इनका समागम हुआ और उनसे श्यामा-श्याम की केलि का सरस वर्णन सुनने को मिला। दोनों मित्र इस लीला गान से विशेष प्रभावित हुए और दोनों ने उन सन्तों  से अपनी गुरु-धारणा  की अभिलाषा प्रकट की। वृन्दावन रसिकों से श्री हित हरिवंश महाप्रभु के परम् रसिक होने का समाचार प्राप्त कर इन्होंने वृन्दावन जा उन्हीं से दीक्षा लेने का निश्चय किया। परन्तु वे गृहस्थी से जल्दी छूट न सके और इसी बीच …

नेही नागरीदास

By : अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
            भक्त कवियों में नागरीदास नाम के तीन कवि विख्यात हैं ,परन्तु राधा-वल्लभ सम्प्रदाय के नागरीदास जी के नाम के पूर्व नेही उपाधि के कारण आप अन्य कवियों से सहज ही अलग हो जाते हैं। नागरीदास जी का जन्म पँवार क्षत्रिय कुल में ग्राम बेरछा (बुन्देलखंड ) में हुआ था। इनके जन्म-संवत का निर्णय समसामयिक भक्तों के उल्लेख से ही किया जा सकता है। इस आधार पर नागरीदास जी जन्म-संवत १५९० के आसपास ठहरता है।
          भक्ति की ओर नागरीदास जी की रूचि शैशव से ही थी। भक्त-जनों से मिलकर आपको अत्यधिक प्रसन्नता होती थी। एक बार सौभाग्य से स्वामी चतुर्भुजदास जी से आप का मिलाप हुआ।  इनके सम्पर्क से  रस-भक्ति का रंग नागरीदास जी को लगा और ये घर -परिवार छोड़कर  वृन्दावन चले आये। यहाँ आकर आपने वनचंद स्वामी से दीक्षा ली. (श्री हितहरिवंश गोस्वामी सम्प्रदाय  और साहित्य :गो ;पृष्ठ ४१७ )
इस प्रकार  रस-भक्ति में इनका प्रवेश हुआ।
       नेही नागरीदास जी हितवाणी और नित्य विहार में अनन्य निष्ठां थी। वे हितवाणी के अनुशीलन में इतने लीन रहते की उन्हें अपने चारों ओर  के वातावरण का भी बोध  न…

ध्रुवदास

By : अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
           राधावल्लभ सम्प्रदाय में ध्रुवदास का भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। इस सम्प्रदाय भक्ति-सिद्धान्तों का जैसा सर्वांगपूर्ण विवेचन इनकी वाणी में  उपलब्ध होता है वैसा किसी अन्य भक्तों की वाणी में नहीं। सम्प्रदाय में विशेष महत्वपूर्ण स्थान होते हुए भी आप के जन्म-संवत आदि का कुछ भी निश्चित पता नहीं है। आपने अपने  रसानन्द लीला  नामक ग्रन्थ में उसका रचना-काल इस प्रकार दिया है :
संवत सोलह सै पंचासा ,बरनत हित ध्रुव जुगल बिलासा। 
इस ग्रन्थ को यदि आप  की  प्रारम्भिक रचना  माना   जाय तो उससे कम से कम बीस वर्ष पूर्व की जन्म तिथि माननी होगी । इस आधार पर आप का जन्म संवत १६३० के आसपास सुनिश्चित होता है। इसीप्रकार ध्रुवदास जी के रहस्यमंजरी लीला नामक ग्रन्थ में उपलब्ध निम्न दोहे के आधार पर इनके मृत्यु संवत १७०० के आसपास का अनुमान लगाया जा  सकता है :
सत्रह सै द्वै ऊन अरु अगहन पछि उजियार। 
                      दोहा   चौपाई  कहें  ध्रुव  इकसत  ऊपर चार।।
ध्रुवदास जी का जन्म देवबन्द ग्राम के कायस्थ कुल में हुआ था।आप के वंश में पहले से ही वैष्णव-पद्धति की अनन्य उपासन…

हरिराम व्यास

By : अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
हरिराम व्यास की राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गणना की जाती है। ओरछानरेश महाराज मधुकरशाह के राजगुरु हरिराम व्यास ब्रजमंडल के प्रसिद्ध रसिक भक्तों में से हैं। इनका जन्म-स्थान  ओरछा (टीकमगढ़ ) राज्य माना  जाता है। व्यास जी के जन्म- संवत  में   कोई ऐतिहासिक या अन्य ऐसा उल्लेख नहीं   मिलता जिसके आधार पर   निर्विवाद  रूप से कुछ कहा जा सके । परन्तु इनकी रचनाओं और अन्य भक्त कवियों की वाणी से जो संकेत उपलब्ध होते हैं  आधार पर व्यास जी का जन्म -संवत १५४९ और मृत्यु-संवत १६५० से  १६५५ के मध्य स्वीकार किया जा सकता है।
        व्यास जी जन्म सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम समोखन शुक्ल था ,इसी नाम को कतिपय स्थलों सुमोखन या सुखोमणि भी लिखा गया है। व्यास जी ने अपने परिवार की परम्परा के अनुकूल शैशव में ही संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। वे बड़े विद्या-व्यसनी पंडित थे। पुराण और दर्शन से विशेष अनुराग था।         व्यास जी सच्चे आस्तिक भाव के गृहस्थ थे ,युवावस्था में उनका विवाह हुआ था। उनकी पत्नी का नाम गोपी कहा जाता है। निम्न  दोह…

राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक : गोस्वामी हितहरिवंश

By : अशर्फी लाल मिश्र

जीवन परिचय :
राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक एवं कवि गोस्वामी हितहरिवंश का जन्म मथुरा मण्डल के अन्तर्गत  बाद ग्राम में हुआ। इनका जन्म वि ० सं ० १५५९ में वैशाख मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को प्रातः काल हुआ। इनके पिता नाम व्यास मिश्र और माता  का नाम तारारानी था। जन्म के अवसर पर इनके पिता बादशाह के साथ दिल्ली से आगरा जा रहे थे। मार्ग में ही बाद  ग्राम में हितहरिवंश जी का जन्म हुआ। इनके जन्म के बाद  व्यास मिश्र देवबन में रहने लगे।
          व्यास मिश्र स्वयं विद्वान थे अतः उन्होंने बालक हरिवंश की उचित शिक्षा का प्रवन्ध आठ वर्ष की आयु में कर दिया। यथा अवसर पर इनका विवाह रुक्मिणी देवी से हुआ। रुक्मिणी देवी से इनके तीन पुत्र ~~

वनचन्द्र कृष्णचन्द्र गोपीचंद्र  तथा एक पुत्री साहिब देवी हुई।         हरवंश जी के जीवन के प्रथम बत्तीस वर्ष देवबन में व्यतीत हुए। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् समस्त गृह-सम्पत्ति ,पुत्र ,स्त्री आदि का त्यागकर ये वृन्दावन की ओर चल पड़े। मार्ग में चिड़थावल ग्राम से इन्होंने राधावल्लभ की मूर्ति लेकर एवं ब्राह्मण की दो कन्याओं  को श्री जी की आज्ञा से स्व…

वल्लभ रसिक

By : अशर्फी लाल मिश्र

परिचय :
श्री वल्लभ  रसिक गौड़ीय सम्प्रदाय के ऐसे दूसरे कवि हैं जिनका साहित्य के किसी ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता। गदाधर भट्ट जी के वंशजों के अनुसार वल्लभ रसिक भट्ट जी के द्वितीय पुत्र थे। इनके बड़े भाई का नाम रसिकोत्तंस था। भट्ट जी अपने दोनों पुत्रों को स्वयं शिक्षा और दीक्षा दी। इस आधार पर वल्लभ रसिक का कविताकाल वि ० सं ० १६५० के आस पास स्वीकार किया जा सकता है। क्योंकि गदाधर भट्ट का समय वि ० सं ० १६००  से कुछ पूर्व का अनुमानित किया गया है । भट्ट जी के पुत्र होने के  कारण  ये भी दक्षिणात्य  ब्राह्मण हैं। किन्तु इन सभी तथ्यों ~~ समय,वंश सम्प्रदाय आदि के विषय में वल्लभ रसिक ने स्वयं कुछ नहीं लिखा। अपनी वाणी में तो महाप्रभु चैतन्य अथवा षट्गोस्वामियों की उन्होंने वन्दना भी नहीं की।
रचनाएँ :

वल्लभ रसिक की वाणी  (प्रकाशक बाबा कृष्णदास ;कल्याण प्रिंटिंग प्रेस ,आगरा ) वल्ल्भ रसिक ने अपने भावों की  अभिव्यक्ति  पद,सवैया ,कवित्त ,दोहा,चौपाई आदि छंदों में की है। ये सभी छान स्फुट रूप में हैं। इन छंदों का मुख्य विषय राधा-कृष्ण का विहार-वर्णन है। इसके अतिरिक्त कुछ पद ,सवैया आदि पव…

माधुरीदास

By : अशर्फी लाल मिश्र

परिचय :
माधुरीदास गौड़ीय सम्प्रदाय के अंतर्गत ब्रजभाषा के अच्छे कवि हैं। अभी तक हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों से इनका कोई परिचय नहीं है। इनकी वाणी के प्रकाशक बाबा कृष्णदास ने इनके विषय में कुछ लिखा है।
माधुरीदास ने केलि-माधुरी  का रचना काल अपने इस दोहे में दिया है :                                    सम्वत सोलह सो असी सात अधिक हियधार।                                     केलि माधुरी छवि लिखी श्रावण बदि बुधवार।। (माधुरी वाणी :केलि माधुरी :दोहा १२९ )            ये  रूपगोस्वामी  के शिष्य थे। इस बात की पुष्टि  माधुरीदास की वाणी के निम्न दोहे से होती है:
                                   रूप मंजरी प्रेम सों कहत बचन सुखरास। 
                                  श्री वंशीवट  माधुरी होहु सनातन    दास।। (माधुरी वाणी :वंशीवट  माधुरी :दोहा ३० ८  )
यहाँ 'रूप मंजरी 'शब्द श्री रूपगोस्वामी के लिए स्वीकर किया गया है। निम्न दोहे से भी ये रूपगोस्वामी के शिष्य होने की पुष्टि होती है ~`
                                  विपिन सिंधु रस माधुरी कृपा करी निज रूप। 
                       …