शुक्रवार, 12 जनवरी 2018

e-Valmiki Ramayana ( Sanskrit text with translation in English ) : Sundarkanda (1)

   Blogger : Asharfi Lal Mishra

Asharfi Lal Mishra













                                                                      || श्री || 

                                                        || श्रीमद्वाल्मीकिरामायणम || 

                                                                THE  RAMAYANA 
                                       
                                                                    (Condensed)

                                                                  (POET - VALMIKI) 

                                                               * SUNDARKANDA*

                                                  
                                                                      Valmiki                                                                      
                                                     
                                                         Hanuman in Ashokvan in Lanka

                                ततो रावणनीतायाः सीतायाः शत्रुकर्शनः। 
                                इयेष  पदमन्वेष्टुं    चारणाचरित्रे    पथि।। 

                Then Hanuman ,the vanquisher of foes ,desired to search along the route frequented by the Charanas  for the place where the Sita ,carried off by Ravana,was.
                           
                            स   सूर्याय   महेन्द्राय   पवनाय   स्वयम्भुवे। 
                            भूतेभ्यश्चांजलिं  बध्वा चकार गमने मतिम।।
     
              Saluting with folded hands ,the Sun,the Great Indra, Vayu , Brahma and all Beings ,he made up his mind to proceed.
                          उत्पपाताथ     वेगेन    वेगवानविचारयन। 
                          सुपर्णामिव  चात्मानं मेने स कपिकुञ्जरः।।

               Then the swift one Hanuman, flew up with speed, undaunted, The best of monkeys verily thought himself equal to Suparna (Garuda).
      
                         स   सागरमनाधृश्यम   अतिक्रम्य  महाबलः। 
                         त्रिकूटशिखरे लङ्कां स्थितां स्वस्थो ददर्श सः।

                That mighty one, after crossing the unconquerable ocean, saw, with a composed mind Lanka situated on the peak of the Trikuta mountain.
  
                        गिरिमूर्ध्नि स्थितां लङ्कां पान्डरैर्भवनैः शुभाम। 
                        स   ददर्श   कपिः   श्रीमान    पुरमाकाशगं यथा।।

                 That auspicious monkey saw the city of Lanka full of delightful white mansions as if it were a city embedded in the sky.

                        पलितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां  विश्वकर्मणा। 
                        प्लवमानामिवाकाशं ददर्श हनुमान पुरीम।।

               Hanuman saw the city ruled over by the best of Rakshasas and built by Vishvakarma, as if was floating in the sky.

                     सत्त्वमास्थाय मेधावी हनुमान मारूतात्मजः। 
                     निशि लङ्कां महासत्त्वो विवेश कपिकुञ्जरः।।

The wise and the highly strong Hanuman,the son of Vayu and the best of monkeys, assumed (all) his strength and entered Lanka in the night.  

                      शुश्राव   जपतां   तत्र  मन्त्रान   रक्षोगृहेषु वै। 
                      स्वाध्यायनिरतांश्चैव यातुधानान ददर्श सः।

                There he heard the mantras of the worshippers in the houses of the Rakshasas. And he saw the demons devoted to the recitation of Holy Scriptures.

                      रक्षितं     सुमहाघोर्रैर्यातुधानैस्सहस्रशः। 
                      राक्षसाधिपतेरगुप्तमाविवेश गृहं कपिः।।

                The monkey (Hanuman) entered the house of the king of the Rakshasas, which was guarded by thousands of highly valorous demons.

                      प्रसादसंघातयुतं    स्त्रीरत्नशतसंकुलम। 
                     सुव्यूढ़कक्ष्यं हनुमान प्रविशेष महागृहम।।

              Hanuman entered that great mansion full of many terraces and hundreds of most beautiful damsels and containing capacious enclosures.

                     तामपश्यन  कपिस्तत्र  पश्यंश्चान्या वरस्त्रियः। 
                     अपक्रम्य तदा वीरः प्रध्यातुमुपचक्रमे।।

                     The heroic monkey, not seeing her (Sita) there and seeing other beautiful women,came out And began to consider;
   
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गुरुवार, 23 नवंबर 2017

शिक्षा का गिरता स्तर चिन्तनीय



Asharfi Lal Mishra











Updated on 11/08/2018
प्राचीन काल  से ही भारत में शिक्षा का विशेष महत्व रहा है। विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय  तक्षशिला  में स्थापित किया गया था। चौथी शताब्दी में में नालंदा विश्वविद्यालय की गणना विश्व के श्रेठ विश्वविद्यालयों में थी। कहा जाता है कि  उस समय नालंदा विश्वविद्यालय में १०,००० विद्यार्थी और २०००  शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय में चरक और सुश्रुत ,आर्यभट्ट ,भाष्कराचार्य,चाणक्य,पतञ्जलि ,वात्स्यायन जैसे उद्भट विद्वान शिक्षक थे।

 इस विश्वविद्यालय ने अपनी राष्ट्रीय और जातीय सीमाओं को तोड़ते हुए चीन,जापान,कोरिया,इंडोनेशिया ,फारस,तुर्की आदि देशों के छात्रों और विद्वानों को आकर्षित किया। यहाँ विज्ञान ,खगोलविज्ञान, गणित ,चिकित्सा ,भौतिक विज्ञान ,रसायन विज्ञान, इंजीनियरिंग के साथ-साथ वेद,दर्शन,सांख्य,योग, तर्क , बौद्ध दर्शन के साथ विदेशी दर्शन की शिक्षा दी जाती थी।

स्वतंत्रता के पूर्व शिक्षा सर्व सुलभ नहीं थी। आजादी के बाद राष्ट्र प्रेमियों, शिक्षा अनुरागियों में विद्यालय खोलने की एक होड़ सी लग गई। परिणाम स्वरुप देश के हर कस्बे में  विद्यालय खुले। छात्र अनुशासित और शिक्षक कर्मठ एवं लगनशील थे। विद्यालय /महाविद्यालय राजनीति से परे थे। परीक्षाओं में नकल का कोई स्थान नहीं था।

वर्ष १९७० के बाद यदा -कदा हल्के फुल्के नकल के प्रकरण दिखाई  पड़ते थे। १९८०-१९९० के दशक में नकल की हवा बहने लगी।

 वर्ष १९८७ में  शिक्षा ने एक घटिया उद्योग का रूप ले लिया। शिक्षा विभाग ने सवित्त मान्यता  के स्थान पर माध्यमिक तक वित्तविहीन और उच्च शिक्षा में स्ववित्त पोषित मान्यताओं का दरवाजा खोल दिया। शिक्षा के इस उद्योग में लगभग प्रत्येक जनप्रतिनिधि भी कूद पड़े। इससे विद्यालयों   के  लिए   निर्धारित  मानदण्ड  तार-तार  गए।

 विद्यालयों,  महाविद्यालयों के साथ -साथ प्राथमिक शिक्षा में भी  शिक्षण,परीक्षण ,निरीक्षण  अनुशासन  एक आदर्श वाक्य तक सीमित हो गए। बोर्ड /विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में ठेके उठने लगे। परीक्षा केंद्रों  , प्राइवेट छात्रों के पंजीकरण केंद्रों एवं मूल्याङ्कन केंद्रों एवं परीक्षा केंद्रों  में छात्र आबंटन हेतु   जिला विद्यालय निरीक्षक के यहाँ  रेट निर्धारित होने लगे।

वर्ष १९९५ में उत्तर प्रदेश के मुख्य   मंत्री  कल्याण सिंह ने नकल अध्यादेश लागू करने  के साथ-साथ स्वकेन्द्र  की व्यवस्था समाप्त कर दी इससे नकल तो रुकी। लेकिन युवा मन की कमजोरी को देखकर  आगामी चुनाव के पूर्व मुलायम सिंह यादव ने  नकल अध्यादेश  समाप्त करने एवं स्वकेन्द्र प्रणाली लागू करने की घोषणा कर दी। बस  यहीं से उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था  गर्त में चली गई। यही स्थति बिहार ,महाराष्ट्र आदि प्रांतों में भी हो गई।

अब स्थिति यह हो गई है कि  प्रदेश में मेरिट के लिए बोली प्रारम्भ हो गई। विश्वविद्यालयों ने उपाधियाँ भी बेचनी शुरू दी। पी-एच डी  की थीसिस भी अन्य के द्वारा लिखी जाने लगीं। अवैध प्रवेश भी शिक्षा उद्योग की एक कड़ी है [1]
 आज युवक अपनी उपाधियाँ लेकर बीच सड़क में या तो उन्हें फाड् रहे हैं या फिर उन्हें जला  कर  अपना आक्रोश जाहिर कर रहे हैं

डुप्लीकेट प्रोफेसर 

आज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में विशेषकर स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों में एक प्रोफ़ेसर चार -चार कॉलेजों में  अपनी सेवाएं दे रहे हैं या फिर अपने  प्रमाण पत्र इन संस्थाओं में जमा कर वेतन ले रहे हैं। देश में ८० हजार  प्रोफ़ेसर  एक से अधिक स्थानों में काम करते पाए गए हैं। [2] [3]

 देश में शिक्षा उद्योग तो पनपा परन्तु  उत्पादन घटिया।  .आज  देश में  स्नातकों ( टेक्निकल  ,चिकित्सा,कानून ,प्रबन्धन,शिक्षा आदि   )की एक लम्बी लाइन है। उनकी न तो अपने देश में और न ही कहीं विदेश  में  पूंछ है।

सरकार के प्रयास 

शिक्षा के क्षेत्र में जो भी प्रयास हो रहे हैं वे  पाठ्यक्रम में संशोधन तक सीमित है  .केन्द्रीय विद्यालयों में स्मार्ट क्लासेज की व्यवस्था हो रही है। केंद्रीय विद्यालय सहित सीबीएसई तथा अन्य बोर्डों (केंद्र व् राज्य ) से मान्यता प्राप्त विद्यालय योग्य शिक्षकों और संसाधन की कमी से जूझ रहे हैं।


बुधवार, 22 नवंबर 2017

नई शिक्षा नीति 2016 : एक दृष्टि

Blogger : Asharfi Lal Mishra
Asharfi Lal Mishra










Updated on 25/12/2017
 भारत ने सदैव से शिक्षा को विशेष महत्व दिया है। विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय  भारत में 700 ई०  पू० तक्षशिला  में स्थापित किया गया  था।  चौथी शताब्दी  में स्थापित  नालंदा विश्वविद्यालय की गणना विश्व के श्रेष्ठ  विश्वविद्यालयों  में थी। कहा जाता है  कि 7 वीं  शताब्दी में नालंदा विश्वविद्यालय में 10,000 छात्र और 2,000 शिक्षक थे। इस विश्वविद्यालय में  चरक औरसुश्रुत,आर्यभट्ट,भास्कराचार्य,चाणक्य,पतंजलि,वात्स्यायन आदि जैसे विद्वान शिक्षक थे।

         विज्ञान,गणित,खगोलविज्ञान,चिकित्सा,रसायनविज्ञान,भौतिक विज्ञान ,इंजीनियरिंग  के साथ -साथ वेद ,दर्शन , सांख्य ,योग ,बौद्ध एवं  विदेशी दर्शन व तर्कशास्त्र के अध्ययन की  विशेष  व्यवस्था थी।  नालंदा विश्वविद्यालय ने  अपनी राष्ट्रीय और जातीय सीमाओं को तोड़ते हुए चीन,जापान,कोरिया ,इंडोनेशिया ,फारस,तुर्की आदि देशों के विद्वानों और छात्रों को अपनी ओर आकर्षित किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हर सरकार ने शिक्षा को एक प्रयोगस्थल के रूप में लिया। पाठ्यक्रम बदलते रहे ,स्कूल खुलते चले गए परन्तु शिक्षा की गुणवत्ता पर किसी ध्यान ही नहीं गया। शिक्षकों के वेतन बढ़ते गए ,छात्र पंजीकृत होते रहे। देश में शिक्षित लोगों  का प्रतिशत बढ़ता चला गया। पास होने के लिए ,नक़ल करने  के लिए बोली लगने लगी। 
  
 राज्य सरकारों द्वारा शिक्षा की अत्यंत  दुर्गति  देखकर  शिक्षक संघों की सशक्त आवाज  पर वर्ष 1976  में  शिक्षा को समवर्ती सूची  में लाया गया। इससे यह कल्पना की गई कि  राज्य और केंद्र दोनों सरकारें मिलकर शिक्षा की हो रही बदहाल स्थिति से निजात मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शिक्षा के समवर्ती सूची में होते ही केंद्र ने राज्य सरकारों को अपने हिस्से का धन आवंटित कर देना केवल अपना कर्तव्य समझ लिया। इससे राज्य पर शिक्षा के धन का  बोझ तो कम  हो  गया लेकिन शिक्षा में कोई  गुणात्मक सुधार नहीं हुआ।   
1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई। इसमें में पाठ्यक्रम ,परीक्षा प्रणाली में  बदलाव और  माध्यमिक शिक्षा तक राज्य की जिम्मेदारी से बचने के मुख्य बिंदु थे। परिणाम  स्वरुप कुछ राज्यों (मध्य प्रदेश ) में  शिक्षकों के  दो काडर हो गए। प्रशासन भी दोहरा।  उत्तर प्रदेश राज्य में  माध्यमिक परीक्षाओं में होने वाली नक़ल को इस नई  परीक्षा प्रणाली में मानों पंख लग गए । 1987 से वित्त विहीन विद्यालयों  की एक  लम्बी श्रंखला खड़ी  हो गई।  उत्तर प्रदेश की माध्यमिक शिक्षा की परीक्षाओं पर नक़ल माफियाओं का आधिपत्य  हो गया।  अब शिक्षा के क्षेत्र में काला  युग प्रारम्भ हो गया।  शिक्षा देने वाले विद्यालय परीक्षाफल  में पिछड़ने लगे और केवल पंजीकृत विद्यालय रिजल्ट में अग्रगणी हो गए। जो स्थिति  माध्यमिक  विद्यालयों की थी ठीक उसी के अनुरूप  प्राथमिक और उच्च शिक्षा की भी  थी। 
        वर्ष 1995 में माध्यमिक और विश्ववद्यालय की परीक्षाओं में नकल रोकने के लिए  उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह   ने नक़ल  अध्यादेश के साथ स्वकेंद्र व्यवस्था को समाप्त कर  नकल रोकने अचूक अस्त्र चलाया और नक़ल रुकी भी परन्तु  मुलायम सिंह ने अगले चुनाव से पूर्व नकल अध्यादेश और स्वकेंद्र समाप्त  करने का सन्देश युवा पीढ़ी को दिया। इसके कारण पढ़ाई की जो गति थी वह भी ठप्प  गई और युवा मन केवल किसी प्रकार प्रमाण पत्र पाने  की दिशा की ओर अग्रसर हो चले।

                                             राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2016  पर संक्षिप्त  टिपण्णी 

                                                             पूर्व प्राथमिक शिक्षा 

नई शिक्षा नीति 2016  के परिपेक्ष्य में  : आंगनबाड़ी केंद्रों  को प्राथमिक विद्यालयों के परिसर में अथवा उसके निकट संचालित किया जायेगा जहाँ  पर 4-5  आयु वर्ग के बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था होगी  और इसके  बाद  इन छात्रों का प्रवेश   प्राथमिक विद्यालयों में होगा। 

 वर्तमान स्थिति : अधिकांश  केंद्र  कागजों पर संचालित हैं। फर्जी पंजीकरण के आधार पर  पौष्टिक आहार उठाया जाता है। इन केन्द्रो का निरीक्षण  या   तो होता ही नहीं या फिर कागजों पर। 

प्रश्न :   पूर्व प्राथमिक शिक्षा  कैसे संचालित होगी ?

                                                                   प्राथमिक शिक्षा 

  •  प्राथमिक शिक्षा में छात्रों को फेल न करने की नीति होगी। 
  • शिक्षण का माध्यम मातृभाषा /क्षेत्रीय भाषा। 
  •  अंग्रेजी अनिवार्य। 
  • कम नामांकन वाले विद्यालयों को समेकित करना।
  • मिड डे मील का पर्यवेक्षण शिक्षकों पर नहीं होगा।  

वर्तमान स्थिति : 
  • शिक्षक उपस्थित होते हैं परन्तु समयनिष्ठा  का अभाव । 
  • दूरस्थ विद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थित चिंताजनक। 
  • निरीक्षण प्रणाली कमजोर। 
  • NPRC की भूमिका केवल विभागीय सूचनाओं का आदान प्रदान करना । 
  • प्रधानाध्यापक मिड डे मील का रिकॉर्ड कीपर। प्रबंधक। 
  • छात्रों का फर्जी पंजीकरण 
  • मान्यता रहित विद्यालयों का समान्तर सञ्चालन। 
  • छात्रों की उपस्थिति चिंताजनक। 
  • छात्रों को समय पर भेजने में अभिभावकों में जागरूकता  अभाव। 
प्रश्न : 
  • छात्रों और शिक्षकों में समयनिष्ठा (Punctuality) कैसे उत्पन्न होगी?
  • समय पर विद्यालय पहुंचे छात्रों की सुरक्षा की गारण्टी कौन लेगा ?
  • छात्र के अनुपस्थित होने पर शिक्षक /अभिभावक में कौन उत्तर दायी होगा?
  • मान्यरहित विद्यालयों को बंद करने में विभागीय अधिकारी असफल क्यों हैं?
  • छात्रों के फेल न होने की नीति से  गुणात्मक शिक्षा का मूल्याङ्कन कैसे होगा ?
  • क्या विद्यालयों के  समेकन  के पहले मान्यतारहित/मानकविहीन विद्यालयों का  सञ्चालन बंद होगा ?
                                                                उच्च प्राथमिक शिक्षा 
  •  छात्रों के फेल होने की नीति लागू होगी। 
  • सूचना प्रणाली (Information Communication Technology )
  • शिक्षण का माध्यम स्थानीय /क्षेत्रीय भाषा /मातृभाषा , अंग्रेजी अनिवार्य तथा संविधान के अन्तर्गत तीसरी भाषा। 
  • कम  छात्रों वाले विद्यालयों का  समेकन 
  • मिड डे मील का पर्यवेक्षण शिक्षकों पर नहीं होगा। 
वर्तमान स्थिति 
  • शिक्षकों की उपस्थिति परन्तु समय निष्ठा का अभाव। 
  • दूरस्थ विद्यालयों में शिक्षकों की उपस्थिति चिंताजनक। 
  • निरीक्षण प्रणाली कमजोर। 
  • NPRC की भूमिका ?.
  • प्रधानाध्यापक मिड डे मील प्रबंधक/रिकॉर्ड कीपर। 
  • छात्रों का कम पंजीकरण का मुख्य कारण मान्यतारहित विद्यालयों का सञ्चालन। 
  • छात्रों की उपस्थिति चिंताजनक 
  • अनर्ह शिक्षकों की कोचिंग से छात्रों का ज्ञान अधकचरा एवं कक्षा में छात्र  भ्रमित हो रहे हैं। 
  • लगभग 30 % छात्राएं  पढ़ाई  छोड़ देती हैं [1]

 प्रश्न 

  •  शिक्षकों एवं छात्रों में समयनिष्ठा (Punctuality) का पालन कैसे होगा ?
  • समय पर विद्यालय पहुंचे छात्रों की सुरक्षा की गारण्टी कौन  लेगा ?
  • छात्रों के  अनुपस्थित होने के लिए शिक्षक/अभिभावक में कौन उत्तरदायी होगा?
  • मान्यतारहित विद्यालयों के सञ्चालन  में  विभागीय अधिकारीयों की क्या भूमिका है ?
  • यदि  कक्षा ६ में प्रवेश हुए छात्रों को  हिंदी,अँग्रेजी और गणित का पूर्व न होने पर सूचना विज्ञान (Information Communication Technology ) का  शिक्षण कार्य कैसे होगा ?
  • विद्यालयों के  समेकन के पूर्व क्या मान्यता रहित विद्यालय बंद   होंगे ?
  • क्या अनर्ह शिक्षकों द्वारा कोचिंग चलती रहेगी ?
                                                     माध्यमिक शिक्षा 

  • विज्ञान ,गणित और अँग्रेजी का पाठ्यक्रम  सम्पूर्ण देश में एक समान। 
  • डिजिटल ज्ञान 
  • कक्षा 10 में विज्ञान ,गणित और अंग्रेजी में दो पाठ्यक्रम 
  1. भाग -क  :उच्च स्तर 
  2. भाग-ख  :निम्न स्तर  

  • कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा अनिवार्य होगी। बोर्ड की परीक्षा में कक्षा 10 का समग्र पाठ्यक्रम होगा। 
  • स्थान्तरण प्रमाणपत्र /स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र  को समाप्त करने की व्यवस्था।
  • मिड डे मील का पर्यवेक्षण शिक्षकों पर नहीं।
 वर्तमान स्थिति 
  • राजकीय , स्थानीय निकाय द्वारा संचालित ,सहायता प्राप्त ,वित्त विहीन मान्यताप्राप्त के अतिरिक्त  गैरमान्यताप्राप्त विद्यालय अस्तित्व में। 
  • राजकीय,स्थानीय निकाय संचालित एवं सहायता प्राप्त विद्यालय शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। 
  • निरीक्षण व्यवस्था नहीं के बराबर। 
  • छात्रों और शिक्षकों में  समयनिष्ठा का अभाव 
  • छात्रों के मूल्याङ्कन की कमजोर व्यवस्था 
  • वित्त विहीन विद्यालयों में केवल  छात्रों का फर्जी पंजीकरण 
  • वित्त विहीन विद्यालयों में  अनर्ह शिक्षकों द्वारा शिक्षण कार्य 
  • अधिकांश वित्त विहीन विद्यालय नक़ल के  सुदृढ़ केंद्र  
  • विद्यालय के गणित ,विज्ञान ,अंग्रेजी एवं वाणिज्य  के शिक्षकों द्वारा   व्यक्तिगत कोचिंग का दबाव। 
  • केंद्रीय  मूल्याङ्कन में निर्धारित उत्तर पुस्तिकाओं से  अधिक   जांचने पर मूल्यांकन   में  औसत  अंक दिए  हैं. 
 प्रश्न 
  • क्या वित्त विहीन विद्यालयों के छात्रों और शिक्षकों का भौतिक सत्यापन की कोई व्यवस्था होगी ?
  • बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल रोकने के क्या ठोस उपाय होंगे  ?
  • वित्त विहीन विद्यालयों में अनर्ह शिक्षक होने बावजूद भी प्रदेश में मेरिट में स्थान कैसे ?
  • माध्यमिक विद्यालयों में प्रयोगशालाओं के अभाव में प्रैक्टिकल कैसे होते हैं ?
  • क्या मान्यता रहित विद्यालय बंद होंगे?
  • क्या माध्यमिक शिक्षकों पर कोचिंग करने पर प्रतिबन्ध लगेगा?
                                                         उच्च शिक्षा 
  • एक विश्वविद्यालय में अधिकतम 100 कॉलेज सम्बद्ध होंगे। 100 से अधिक होने पर दूसरा विश्वविद्यालय गठित होगा 
  • राष्ट्रीय उच्च शिक्षा अध्येतावृत्ति के प्रबंधन हेतु स्वतंत्र तंत्र की व्यवस्था। 
  • प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान की एक समर्पित वेबसाइट  अनिवार्य। जिसमें 
  1. संकाय 
  2. प्रवेश शुल्क 
  3. कार्यक्रम 
  4. परीक्षा परिणाम 
  5. प्लेसमेंट 
  6. शासन 
  7. वित्त बिज़नेस टाई -उप 
  8. प्रबंधन आदि पारदर्शी विधि से सूचनाएँ 
  •  नवीन शैक्षणिक पदों पर  नियुक्ति के पूर्व राष्ट्रीय या राज्य प्रशिक्षण अकादमी से 3-6 मास  प्रशिक्षण अनिवार्य। 
                                     वर्तमान स्थिति 
  • राजकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालय शिक्षकों की कमी का कर रहे सामना। 
  • स्ववित्त पोषित कॉलेज केवल छात्र पंजीकरण के केंद्र। 
  • स्ववित्त पोषित कॉलेज/ निजी यूनिवर्सिटी /डीम्ड में अनर्ह शिक्षकों द्वारा शिक्षण कार्य भी। 
  • स्ववित्त पोषित कॉलेजों  में उठते नकल के ठेके।
  • एक  ही शिक्षक का नाम कई स्ववित्त पोषित कॉलेजों में। 
  • उपाधियाँ भी खरीदी जा रहीं। 
  • छात्रों पर कोचिंग का रहता दबाव। 

प्रश्न 
  • क्या स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों में छात्रों और शिक्षकों का भौतिक सत्यापन होगा ?
  • क्या स्ववित्त महाविद्यालय अपने कॉलेज की वेबसाइट पर पारदर्शी ढंग से  शिक्षकों सहित सम्पूर्ण वांछित विवरण अपलोड करेंगे ?
  • केंद्रीय मूल्याङ्कन में  एक दिन में  निर्धारित उत्तर पुस्तिकाओं से अधिक  उत्तर पुस्तिकाएं क्यों आवंटित की जाती हैं। 
                                                             कुछ सार्थक प्रयासों  की शुरुआत 
  • नई शिक्षा नीति २०१६ में शिक्षा पर  दुगुने धन की व्यवस्था 
  • शिक्षकों की नियुक्ति में गुणात्मक पहलू पर जोर 
  • अयोग्य शिक्षकों की छटनी 
  • परीक्षा केंद्रों के निर्धारण में  कुछ सुचिता का प्रयास 
                                                          कुछ अनछुए पहलू  
  • मान्यतारहित विद्यालय /मानक विहीन विद्यालय  शिक्षा  के ब्लैक स्पॉट 
  • अनर्ह शिक्षकों द्वारा कोचिंग 
  • पंजीकृत/अपंजीकृत  कोचिंग की समय सारिणी एवं शिक्षकों की योग्यता का निरीक्षण
  • शिक्षकों के कार्य स्थल से आवास की दूरी अधिक होना 
  • अधिकांश शिक्षक अपने बच्चों को  अपने स्कूल/बोर्ड/कॉलेज में प्रवेश नहीं दिलाते।  
अभिमत 
            हमारा अभिमत है   कि  जब तक  विभाग की निरीक्षण प्रणाली  भ्रष्ट रहेगी तब तक  शिक्षा में किसी बदलाव की कल्पना कठिन है।  जब तक अनर्ह शिक्षकों  एवं मान्यता रहित विद्यालयों  / मानक विहीन विद्यालयों को प्रतिबन्धित नहीं किया जाता तब तक शिक्षा में बदलाव एक दिवा स्वप्न होगा। जब  तक महाविद्यालयों में  बिना प्रयोगशालाओं  के  अनर्ह शिक्षक  शिक्षण कार्य करेंगे  तब तक  ये महाविद्यालय केवल  एक पंजीकरण केंद्र ही रहेंगे   और छात्रों की उपाधियाँ मात्र एक कागज का टुकड़ा होंगी। अनर्ह शिक्षकों  द्वारा कोचिंग से छात्र कक्षा में भ्रमित होते हैं और उनका भविष्य चौपट हो जाता हैं
। 

रविवार, 5 नवंबर 2017

जन प्रतिनिधियों की निर्धारित हो न्यूनतम अर्हता


Asharfi Lal Mishra










Updated on 29/09/2018
समाज सेवा लोगों की  भलाई के निमित्त ,त्याग एवं परोपकार की भावना से  किया गया   कार्य है।  इस कार्य के  बदले में कुछ भी  वापस पाने की इच्छा नहीं की जाती। एक समाज सेवक के लिए जरूरी है  कि  उसे पर पीड़ा का अनुभव हो। उसके ह्रदय में सदैव

                              परहित सरिस धरम नहिं भाई 

 का भाव उद्वेलित होना चाहिए। 

लोकतन्त्र  में समाज सेवकों का विशेष महत्व है  क्योंकि यही समाज सेवा करने वाले व्यक्ति जनता द्वारा निर्वाचित  होकर     विधान सभा , लोक सभा आदि में  जनता के प्रतिनिधि के रूप में पहुँचते हैं। यही नहीं ये जन प्रतिनिधि  विधान मण्डल /संसद  में  कानून  की  रचना  एवं  संविधान संशोधन तक में योगदान  करते हैं। 

 चूँकि जन प्रतिनिधि का काम समाज सेवा के अतिरिक्त कानून  का निर्माण भी है ऐसी सूरत में  कम शिक्षित या फिर अपढ़ व्यक्ति उस कानून की बारीकियों को कैसे समझ सकते हैं । यही जन प्रतिनिधि मंत्री,मुख्य मंत्री एवं प्रधान मंत्री के पद पर आसीन होते हैं।  कभी -कभी तो बिना किसी अनुभव के सीधे ही मुख्य मंत्री या प्रधान मंत्री की कुर्सी पर आसीन हो जाते हैं। ऐसी सूरत में  नौकरशाही की  इच्छा  पर ही प्रशासन  चलता है जो लोकतंत्र की भावना के विपरीत है। 

प्रशासन  पर नियन्त्रण 
 लोकतंत्र में  मंत्री,मुख्य मंत्री और प्रधान मंत्री के साथ साथ  जिले में  सांसदों /विधायकों  का भी  स्थान लोक सेवकों से ऊँचा है। हमारा कहने का आशय यह है कि सरकार के  सक्षम जन प्रतिनिधि  ही  अपने विभाग पर नियंत्रण  कर सकते हैं।  

अर्हता  की आवश्यकता 

(१) शैक्षिक 
 चूँकि  यह जन प्रतिनिधि संसद / विधान मण्डल  में  कानून का निर्माण करते हैं. ऐसी सूरत में  इनके  लिए जरूरी है कि  वे कम से कम स्नातक  की उपाधि  प्राप्त हों जिससे वे कानून की  भाषा और उसकी बारीकियों से अवगत  हो जायँ। प्रायः संसद और विधान मंडल  की  कार्यवाही (TV) देखने से प्रतीत होता है कि  किसी अधिनयम  में  संशोधन  या फिर  किसी  अधिनियम  के निर्माण के अवसर पर  अधिकांश प्रतिनिधि  मूक दर्शक रह कर  मेजें  थप- थपा कर उसका  समर्थन  करते हैं या  फिर  अनुचित तरीके से विरोध व्यक्त करते हैं।  कभी -कभी यह भी देखने पर आता है कि  प्रतिनिधि  विषय वस्तु  से हट कर भी तर्क प्रस्तुत करते हैं। 
(२) समाज सेवा 
 समाज सेवा करना  जन प्रतिनिधियों का मुख्य उद्देश्य  निर्धारित है। इन जन प्रतिनिधियों के लिए  समाज सेवा  विषय के साथ चार वर्षीय बी टेक (Social Work ) की उपाधि भी निर्धारित की जानी  चाहिए।  इसमें पाठ्य क्रम ऐसा हो कि जिसमें विभिन्न क्षेत्रों में  फील्ड का प्रैक्टिकल वर्क ६०%   अनिवार्य हो। कई  प्रतिनिधि ऐसे होते जो सीधे थोप दिए जाते हैं ऐसे प्रतिनिधि मंत्री भी बनने में सफल हो जाते है लेकिन इन मंत्रियों /प्रतिनिधियों ने  जनता की व्यावहारिक ,सामाजिक ,शैक्षिक ,आर्थिक कठिनाइयों का कभी भी प्रत्यक्ष  अनुभव नहीं किया। 
 एक मीटिंग के अवसर पर जब एक प्रतिष्ठित सांसद  से  यह पूंछा गया कि हमारे आलू सड़ रहे हैं। सांसद ने  उत्तर दिया कि आप लोग आलू की फैक्ट्री लगाइये। यह सांसद किसानों की समस्या से अनभिज्ञ थे इस लिए ऐसा उत्तर दिया। एक अन्य विशिष्ठ प्रतिनिधि ने एक प्रश्न के उत्तर में कहा था आप लोग शकर बोइये। ये दोनों ही उत्तर  उन  जन प्रतिनिधियों के थे जो बिना सामाजिक  कार्य किये ही ऊपर से थोप दिए गए थे।

हरियाणा सरकार  ने सांसदों /विधयकों की  न्यूनतम  शैक्षिक अर्हता   निर्धारित करने   के लिए  केंद्र  सरकार को पत्र लिखा है [a]

लोकतंत्र में बढ़ता सत्ता का आकर्षण

 आज लोकतंत्र में सत्ता प्राप्ति की अभिरुचि सभी लोगों में है। चाहे वे लोक सेवक के रूप में  उच्च पद पर आसीन रहे हों,उद्योपति  हों , फिल्म अभिनेता हों या फिर खेल जगत से सम्बंधित हों। प्रायः देखने में आता है  कि फिल्म अभिनेता भीड़  जुटाने में अधिक सफल रहते है. और केवल  जन प्रतिनिध  बनने में ही सफल  नहीं होते बल्कि सत्ता पर काबिज होते देखे गए। भारत का तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जहाँ अभिनेता से राजनेता बनकर  कई दशक तक राज्य के शासन की बागडोर सम्हाली गई । ऐसे राजनेता अर्थ की धमक से सत्ता पर काबिज हो जाते हैं उन्हें  समाजसेवा करने का  न  कोई  जमीनी  अनुभव और न अनुभूति। हाँ इतना अवश्य है ऐसे  लोग समाज सेवा के लिए भारत रत्न का पुरस्कार अवश्य मांग करते देखे गए । 

महिला जनप्रतिनिधि : अधिकांश महिलायें किसी  लोक सेवक के पद  से त्याग पत्र  /अवकाश प्राप्त  के पश्चात्  या राजनीतिक पृष्ठ भूमि के परिवारों से सम्बद्ध ही  सीधे सक्रिय राजनीति में प्रवेश करती हैं।

आज  जन प्रतिनिधि के लिए समाज सेवा आवश्यक नहीं है। हाँ धन बल चाहिए और इस बल से  समाज सेवक होने का प्रमाण पत्र प्राप्त भी हो जाता है।

पंचायतों में अनिवार्य योग्यता 
 राजस्थान और हरियाणा  की पंचायतों में चुनाव लड़ने वालों ले लिए अनिवार्य योग्यता है। अन्य राज्यों में भी पंचायतों में अनिवार्य योग्यता  का निर्धारण  करने के लिए केंद्रीय मंत्री मेनका गाँधी  ने प्रदेश के मुख्यमंत्रियों को पत्र  लिखने की बात कही [1] . उत्तराखंड में सरकार ने पंचायत के चुनाव में उम्मीदवारों के लिए  न्यूनतम अर्हता निर्धारित करने के लिए निश्चय किया। योग्यता का निर्धारण ग्राम पंचायत ,क्षेत्र पंचायत एवं जिला पंचायत के सभी पदों के लिए होगा। 1(a)

अभिमत 
(१) सत्ता पर अच्छी पकड़ और  कानून के अच्छे ज्ञान के लिए जन प्रतिनिधि (सांसद /विधायक ) के लिए न्यूनतम शैक्षिक अर्हता  स्नातक होनी चाहिए एवं
(२) जनता की वास्तविक  समस्याओं  की अनुभूति के लिए  समाज कार्य ( Social Work ) में  दो वर्षीय  डिप्लोमा पाठ्य क्रम
अथवा
१०+२  के पश्चात् सोशल वर्क में चार वर्षीय बी टेक  की  उपाधि।

 हमारा उक्त अर्हता सम्बन्धी विचार केवल समाज सेवा में नवीन पदार्पण करने वाले लोगों के निमित्त है। इससे केवल समाज सेवा के  वास्तविक एवं इच्छुक व्यक्ति ही  राजनीति  की ओर अग्रसर होंगे और धन बल के आधार पर  लोगों का  सीधे राजनीति में प्रवेश पर अंकुश लगेगा।

जब पंचायत प्रतिनिधियों के लिए योग्यता का निर्धारण हो सकता है तो सांसदों/विधायकों के लिए क्यों नहीं।




बुधवार, 21 जून 2017

मुस्लिम कृष्ण भक्त कवि : रसखान

  By : अशर्फी लाल मिश्र    
Asharfi Lal Mishra
                                                                                                                                                       


                                                                  
 रसखान
                                                                    
परिचय : बृजभाषा के प्रसिद्ध मुसलमान कवि रसखान के जन्म-संवत ,जन्म-स्थान आदि के विषय में तथ्यों के अभाव  में निश्चित रूप से कुछ कह सकना सम्भव  नहीं है। अनुमान किया गया है कि सोलहवीं शताब्दी ईसवी के मध्य भाग में उनका जन्म  हुआ होगा। (हिंदी साहित्य :डा० हजारी प्रसाद  द्विवेदी :पृष्ठ २०७ ) रसखान ने अपनी कृति  प्रेमवाटिका के रचना काल का उल्लेख निम्न दोहे में किया है :
                     विधु सागर रस इंदु सुभ बरस सरस रसखानि। 
                     प्रेमवाटिका रचि रुचिर चिर-हिय-हरष बखानि।।
                      (प्रेमवाटिका :दोहा ५१ )
      सम्भवतः इसी दोहे के आधार पर डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने प्रेमवाटिका का रचना-काल वि० सं० १६७१ अर्थात ईसवी सन १६१४ स्वीकार किया है (हिंदी साहित्य :पृष्ठ २०६ )उक्त मान्यता में दोहे के सागर शब्द का अर्थ सात लिया गया है। किन्तु सामान्यतः छन्दशास्त्रों में सागर का अर्थ चार का सूचक है और तदनुसार प्रेमवाटिका का समय वि०सं०  १६४१ सिद्ध होता है। रसखान और गो० विट्ठलनाथ की भेंट को सम्मुख रखते  हुए  यह संवत अधिक संगत प्रतीत होता है। 'दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता 'में रसखान की भी वार्ता सम्मिलित है। इस वार्ता के अनुसार ये गोस्वामी विट्ठलनाथ के बड़े कृपापात्र शिष्य थे। गोस्वामी विट्ठलनाथ का परलोकगमन १६४२ विक्रमी संवत में हुआ था। अतः यह निश्चित है कि इस समय तक रसखान गोस्वामी जी का शिष्यत्व स्वीकार कर चुके होंगे। इसी आधार पर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इनका कविता काल वि ० सं ० १६४० के उपरांत स्वीकार किया है। (हिन्दी साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १९२ )
        रसखान अथवा रसखानि कवि का उपनाम है। इनका वास्तविक नाम क्या था आज तक निश्चित नहीं है। शिवसिंह सरोज में इन्हें सैयद इब्राहीम पिहानी वाले लिखा गया है। किन्तु  दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता में रसखान दिल्ली के पठान कहे गए हैं। स्वयं रसखान ने भी इसी बात का संकेत निम्न पंक्तियों में किया है।
                       देखि  ग़दर हित  साहिबी दिल्ली नगर मसान। 
                       छिनक  बाढ़सा-बंस  की ठसक छोरि रसखान।।
                       प्रेम  निकेतन  श्री  बनहि  आय गोवर्धन-धाम। 
                       लह्यो सरन चित चाहिकै जुगल सरूप ललाम।।
          इस कारण डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'रसखान 'नाम के दो कवियों का उल्लेख किया है

  1. सैयद इब्राहीम पिहानी वाले 
  2. गोसाईं विट्ठलनाथ जी के कृपापात्र शिष्य सुजान  रसखान 
              (हिन्दी साहित्य :पृष्ठ २०६ )
दूसरी ओर विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने अनुमान के आधार पर 'पिहानी वाले ' और दिल्ली के पठान रसखान की एकता बताते हुए लिखा है :
       यदि पिहानी से इनका सम्बन्ध रहा हो तो यही अनुमान करना पड़ेगा कि हुमायूँ की अनुकूलता और अकबर के अनुग्रह से सैयदों को दिल्ली में भी कुछ आश्रय स्थान अवश्य मिला होगा। संभव है ये पिहानी से दिल्ली चले गए हों और वहीं रहने लगे हों। (रसखानि ग्रन्थावली :पृष्ठ २५ ) इस प्रकार रसखान के जन्म-स्थान के विषय में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है। किन्तु रसखान की ऊपर उद्धृत पंक्तियों से यह सर्वथा स्पष्ट है कि इनका सम्बन्ध शाही खानदान  से था  और यह उस समय जब सिंहासन के लिए ग़दर होने के कारण दिल्ली श्मशानवत हो रही थी तब दिल्ली और बादशाह बंश की ठसक छोड़कर वृन्दावन में आगये और यहीं कृष्ण-माधुरी का पान एवं गान करते हुए निवास करने लगे। इस ग़दर का काल भी इतिहास के आधार पर अकबर के  राज्य-काल में संवत १६४० विक्रमी के आसपास स्वीकार किया जा सकता है। (रसखानि ग्रंथावली :पृष्ठ २७ )
        दिल्ली छोड़कर प्रेम-धाम आने उक्त राजनैतिक कारण के अतिरिक्त अन्य कुछ कारणों का उल्लेख ' दो सौ चौरासी वैष्णवों की वार्ता 'एवं किम्बदन्तियों में  मिलता है। इनके  अनुसार पहले रसखान किसी साहूकार के पुत्र अथवा स्त्री के रूप पर इतने  मुग्ध थे कि एक क्षण के लिए भी उसे देखे बिना न रह सकते थे। श्रीकृष्ण की रूप-छवि देखकर इनके प्रेम का विषय और ही हो गया। रसखान के निम्न  दोहे से भी यही सूचित होता है। 
                         तोरि  मानिनी  ते  हियो  फोरि मोहिनी मान। 
                         प्रेमदेव की छबिहिं लखि भए मियां रसखान।।
रचनाएँ :
*सुजान रसखान 
*प्रेम वाटिका 
*दानलीला 
माधुर्य भक्ति :
        रसखान का   साध्य भी सूरदास ,हितहरिवंश आदि  कृष्ण-भक्त कवियों की   भांति  प्रेम की प्राप्ति रहा है। रसखान ने प्रेम-वाटिका में अपने इस  साध्य तत्व को स्पष्ट करते हुए कहा है :
                        ज्ञान ध्यान विद्या मती,मत बिस्वास बिवेक। 
                        विना  प्रेम  सब  धूरि है, अगजग एक  अनेक।।
                        प्रेम  फांस  में  फँसि  मरे, सोई  जिये  सदाहिं। 
                        प्रेम-मरम जाने बिना,मरि कोउ  जीवत नाहिं।। (प्रेम-वाटिका :दोहा २५-२६ )
तथा ---
                       जेहि  पाएं  वैकुंठ  अरु, हरिहूँ  की  नहिं चाहि। 
                       सोइ अलौकिक सुद्ध सुभ,सरस सुप्रेम कहाहि।।(प्रेम-वाटिका :दोहा २८ )
       वास्तव में रसखान की दृष्टि में प्रेम और हरि अभेद्य हैं। क्योंकि प्रेम हरि का रूप है और स्वयं हरि प्रेम-स्वरुप हैं अतः हरि और  प्रेम में उसी प्रकार की अभिन्नता है जिस प्रकार की  सूर्य  और धुप में है।
                      प्रेम हरी को  रूप  है ,त्यों हरि प्रेम-सरूप। 
                      एक होइ द्वै यों लसे,ज्यों सूरज अरु धूप।। (प्रेम-वाटिका :दोहा २४  )
       रसखान के विचार  में आनन्द की प्राप्ति केवल प्रेम के द्वारा सम्भव है। वह उन सभी पदार्थों से विलक्षण है जिनसे प्राणी-मात्र  परिचय होता है :
                    दंपति सुख अरु विषय रस,पूजा ,निष्ठा,ध्यान। 
                    इनते    परे   बखानिए,  शुद्ध    प्रेम     रसखान।।(प्रेम-वाटिका :दोहा १९ )
        इसी कारण रसखान ने प्रेम के विषय में कहा  है --
                   प्रेम अगम अनुपम अमित ,सागर सरिस बखान। 
                   जो  आवत  एहि  ढिग बहुरि जात नाहिं रसखान।।
                   कमल तंतु  सो  छीन अरु, कठिन खड्ग की धार। 
                   अति    सूधो    टेढ़ो    बहुरि,  प्रेमपंथ    अनिवार।। (प्रेम-वाटिका :दोहा ३ और ६  )
       इस प्रकार का  अगम प्रेम रूप,गुण,धन और यौवन  आकर्षण से रहित, स्वार्थ से मुक्त सर्वथा शुद्ध होता है और इसीलिए इसे सकल-रस खानि कहा गया है। एक दोहे  में प्रेम का स्वरुप  प्रकार प्रस्तुत  गया है :
                  रसमय, स्वाभाविक,बिना स्वारथ अचल महान। 
                  सदा  एक   रस   शुद्ध  सोइ   प्रेम  अहे   रसखान।।(प्रेम-वाटिका :दोहा ४२ )
       इस शुद्ध प्रेम के  बिना ज्ञान,कर्म और उपासना केवल अहंता को बढ़ाने वाला है अर्थात  साधनों  साध्य प्रेम नहीं है तो यह केवल दुखप्रद है और प्रेम की जिसे प्राप्ति हो गई उसके लिए कुछ जानना शेष नहीं रह जाता।
                 जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं,जान्यों जात बिसेस। 
                 सोई   प्रेम, जेहि  जानिके,रहि  न जात कछु सेस।। (प्रेम-वाटिका :दोहा १८ )
     
        वेद मर्यादाएँ तथा जागतिक  नियम इस प्रेम की प्राप्ति में विघ्न-रूप सिद्ध होते हैं। अतः जब तक साधक इन नियमों को दृढ़ता से पकड़े रहता है तब तक उसे प्रेम की प्राप्ति नहीं होती और दूसरी ओर यदि साधक के ह्रदय में प्रेम का प्रकाश हो जाता है उस समय ये सभी नियम बंधन स्वतः छूट जाते हैं:
                   लोक-वेद-मरजाद  सब लाज काज संदेह। 
                   देत बहाए प्रेम करि,विधि निषेध को नेह।। (प्रेम-वाटिका :दोहा ७  )
        रसखान ने प्रेम-रस  देने वाले  के रूप में राधा-कृष्ण  स्मरण किया है। उनके अनुसार यही युगल-रूप वह माली है जिनके कारण प्रेमवाटिका सदा हरी भरी रहती है :
                   प्रेम-अयनि श्री राधिका,प्रेम बरन नन्दनन्द। 
                   प्रेम  बाटिका  के  दोऊ,माली  मलिन द्वन्द।।(प्रेम-वाटिका :दोहा १ )
        यद्यपि उक्त दोहे में रसखान ने राधा और कृष्ण दोनों को प्रेम का विकास करने वाले के रूप में स्वीकार किया है ,तथापि सामान्य रूप से उन्होंने कृष्ण को ही अपना इष्ट है। सुजान रसखान के अनेक सवैयों तथा कवित्तों से इसी बात की पुष्टि होती है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है :
                   बांसुरीवारो बड़ो रिझवार है,स्याम जु नैसुक ढार ढरैगो। 
                   लाड़लो छैल वही तो अहीर को पीर हमारे हिये की हरैगो।। 
                        (सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र :सवैया ७ )
       प्रेम-लीलाओं  वर्णन में भी कवि ने राधा को गोपियों से विशिष्ट स्थान नहीं दिया है। हास-परिहास छेड़-छाड़ ,रास आदि के वर्णन में गोपी सामान्य का वर्णन उपलब्ध होता है। किन्तु कुछ सवैये ऐसे हैं जिनमें राधा को कृष्ण की दुलही के रूप  में स्वीकार कर उनको स्वकीया माना गया है। इन्हीं सवैयों के आधार पर राधा की अन्य गोपियों से महत्ता सिद्ध  है :
                      मोर  के  चंदन  मोर  बन्यौ  दिन दूलह है अली नंद को नंदन।
                     श्री बृषभानुसुता  दुलही  दिन  जोरी  बनी  बिधना  सुखकंदन।।
                     आवै कह्यौ न  कछु रसखानि री दोऊ फंदे छवि प्रेम के फंदन। 
                     जाहि  बिलोकें  सबै  सुख  पावत  ये  ब्रज  जीवन  हैं दुखदंदन।।
                            (सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र :सवैया १९० )
       नन्दनन्दन कृष्ण की अपूर्व छवि देखकर गोपियाँ कृष्ण को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती हैं। कृष्ण के बिना उन्हें अब चैन नहीं पड़ता। रात-दिन वही सांवली सलोनी मूरत उनकी आँखों के सम्मुख खड़ी रहती है। कृष्ण की रूप-छवि के साथ-साथ गोपी की व्याकुलता का वर्णन कवि द्वारा निम्न  शव्दों में :
                    सोहत  है  चंदवा  सिर  मोर   के  जैसिये  सुंदर  पाग   कसी है। 
                    तैसिये  गोरज  भाल  बिराजति  जैसी  हिये  बनमाल  लसी है। 
                    रसखानि बिलोकत बौरी भई दृग मूँद के ग्वालि पुकारि हँसी है। 
                    खोलारि  घूंघट  खोलों  कहा  वह  मूरति  नैनन  माँझ   बसी है।
                            (सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र :सवैया १७९ )
      कृष्ण के प्रति इस अनुराग को गोपियाँ स्वयं स्वीकार करती हैं ~
                    जा  दिन  ते  निरख्यो नंदनंदन कानि तजी घरबंधन छूट्यो। 
                    चारु  विलोकनि कीनी सुमार सम्हार गई मन मार ने लूट्यो। 
                    सागर को सरिता जिमि धावै न रोकी रहे कुल को पुल टूट्यो। 
                    मत्त  भयो  मन  संग  फिरै  रसखानि सरूप सुधारस लूट्यो।।
                          (सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र :सवैया १७८ )
       गोपियाँ केवल रूप से प्रभावित हुई हों ऐसी बात नहीं है। वृन्दावन कानन में बजने वाली कृष्ण की बाँसुरिया  भी उन्हें मोहित कर लेती है ,उनके मन को मथ  डालती है और इस प्रकार उन्हें अधीर बना देती है। कृष्ण बाँसुरी में मधुर-तान आलापने के साथ-साथ गोपियों का नाम ले लेकर उन्हें बुलाते हैं और इस प्रकार उनके मन का धैर्य तो डिग ही जाता है किन्तु गाँव-गाँव में उनके अनुराग की चर्चा चल पड़ती है। ऐसी स्थिति में गोपियों का यह कहना अत्यधिक स्वाभाविक है :
                   कान्ह  भए  बस  बाँसुरि  के  अब  कौन  सखी  हमको  चहि  है । 
                   निस द्यौस रहे संग साथ लगी यह सौतनि तापन क्यों सहि है।
                   जिन मोहि लियो  मन मोहन  को रसखानि सदा हमको दहि है। 
                   मिल  आओ  सबै  सखी  भाग चलैं अब तो ब्रज में बंसुरी रहि है।। 
                               (सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र :सवैया ६४  )


                   साभार स्रोत:
  • हिंदी साहित्य :डा० हजारी प्रसाद  द्विवेदी
  • दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • हिन्दी साहित्य का इतिहास:आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 
  • रसखानि ग्रन्थावली 
  • सुजान रसखानि :सं० विश्वनाथ  मिश्र 
  • प्रेमवाटिका 

                      
       

     


शनिवार, 17 जून 2017

कृष्णदास

       By : अशर्फी लाल मिश्र
             
                                                             अशर्फी लाल  मिश्र 
                                                                     
                                                                कृष्णदास 

इतिवृत्त :आचार्य वल्लभ के शिष्य कृष्णदास का जन्म डा० दीनदयाल गुप्त के अनुसार वि०  सं० १५५२ में और निधन वि० सं० १६३२ और १६३८ के बीच में हुआ। चौरासी वैष्णवों की वार्ता के अनुसार ये गुजरात के चिलोतरा ग्राम में एक कुनबी के घर में उत्पन्न हुए थे। कृष्णदास अनुसूचित जाति के  होने पर भी आचार्य के विशेष कृपा पात्र थे। किन्तु गोस्वामी विट्ठलनाथ जी   इनके आचरण  से सदैव अप्रसन्न रहते थे।
     गोकुलनाथ रचित वार्ता से इनके जीवन तथा चरित्र पर जो प्रकाश  पड़ता है उसके अनुसार ये रसिक स्वभाव के थे। दूसरी ओर ये चतुर और हठवादी भी बहुत थे। इनकी इस हठवादिता तथा शासन-चतुरता  के कारण इनके समकालीन भक्त अथवा गो० विट्ठलनाथ ही नहीं स्वयं श्रीनाथ जी भी परेशान रहते थे। इसी स्वभाव के कारण जो इनकी दुर्गति हुई- उससे
                  अधो गच्छन्ति तामसाः 
वाली उक्ति स्वयं चरितार्थ हो उठती है। इतने बुरे स्वभाव के होते हुए भी अपनी शासन-चतुरता के कारण कृष्णदास का अपने सम्प्रदाय में विशेष सम्मान था। सम्प्रदाय की नींव को अधिक से अधिक दृढ़ करने की चेष्टा इन्होंने समस्त जीवन भर की। उसके लिए इन्होंने अच्छे अथवा बुरे सभी साधनो का उपयोग किया। तात्पर्य यह है कि इन्होंने भगवान् की कीर्तन-सेवा से इतर श्रीनाथ जी के मन्दिर  की व्यवस्था  तथा सम्प्रदाय के प्रसार की ओर विशेष ध्यान दिया।
काव्य-रचना ;
  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार (हिन्दी  साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १७६ )  निम्न तीन ग्रन्थ  जो प्राप्य नहीं हैं :

  1. जुगल भान चरित्र 
  2. भ्रमरगीत 
  3. प्रेम तत्व-निरूपण 


 * स्फुट पद (वर्षोत्सव ग्रन्थों में संकलित )
माधुर्य भक्ति :
       वृन्दावन में नित्य विहार करने वाले राधा-कृष्ण कृष्णदास के उपास्य हैं। ये उपास्य-युगल रसमय ,रसिक और नवल-किशोर हैं। नाना प्रकार की लीलाएँ  करना ही इनका उद्देश्य है भक्त इन्ही लीलाओं का गान करता है और ध्यान करता है। राधा-कृष्ण की मधुर-लीलाओं का गान ही कृष्णदास की उपासना है। राधा-कृष्ण के प्रेम के अतिरिक्त गोपी-कृष्ण के प्रेम का भी वर्णन इन्होंने किया है। इसी प्रेम की पूर्वराग के पदों में कृष्ण की रूप माधुरी का सुन्दर वर्णन लक्षित होता है :
                  देखि जीऊँ माई नैन रंगीलो। 
                  ले  चलि  सखी  तेरे  पाइ  लागों  जहाँ  गोबरधन  छैल   छबीलो।।
                  रसमय  रसिक  रसिकनी  मोहन  रसमय  बचन  रसाल रसीलो। 
                  नवरंग  लाल  नवल  गुन  सुन्दर  नवरंग भाँति नव  नेह नवीलो।।
                  नख  सिख  सींव  सुभगता  सींवा  सहज सुभाइ  सुदेस    सुहीलो। 
                  कृष्णदास प्रभु रसिक मुकुट मनि सुभग चरित रिपुदलन हठीलो।।
        कृष्ण की रूप-माधुरी से मुग्ध गोपी ,कृष्ण-दर्शन के लिए सदा लालायित रहती है। किन्तु उसे लोक-लाज का भय  उन दर्शनों से सदा वंचित रखता है। अन्त  में जल मरने के निमित्त  वह पनघट पर पहुँचती है और वहाँ कृष्ण को पाकर लोक-लाज को त्याग उन्हीं के प्रेम-रस में मग्न हो जाती है :
                  ग्वालिन कृष्ण दरस सों अटकी। 
                  बार बार पनघट पर आवत सर जमुना जल मटकी।।
                  मनमोहन को रूप सुधानिधि पीवत प्रेम रस गटकी। 
                  कृष्णदास  धन्य  धन्य  राधिका लोक लाज पटकी।। 
      श्रीकृष्ण-मिलन पर गोपी को जिस सुख की प्राप्ति होती है उसका वर्णन भी संक्षेप में किया गया है। इस कारन उनके पदों में भाब-तल्लीनता का गुण अधिक लक्षित नहीं होता। किन्तु कुछ पदों में लीला का सुन्दर वर्णन किया गया है। नृत्य के निम्न पद में तत्कालीन सभी हाव-भाव तथा मुद्राओं का उल्लेख किया गया है:
                  अद्भुत  जोट  स्याम   स्यामा   बर  विहरत   वृन्दावन   चारी। 
                  रूप  कांति  बन  विभव  महिमा  रटत बन्दि श्रुति मति हारी।।
                  पद  विलास  कुनित   मनि  नूपुर  रुनित  मेखला  कुनकारी। 
                  गावत  हस्तक  भेद  दिखावत  नाचत  गति मिलवत न्यारी।।
                  किलकत हँसन कुरखियनि चितवत प्यारे तन प्रीतम प्यारी। 
                  कंठ  बाहु  धरि  मिलि  गावत  हैं  ललितादि  सखी बलिहारी।।
                  मूरतिवंत  सिंगार  सुकीरत  निरखि  चकित मृग अलि नारी। 
                  कृष्णदास प्रभु गोवर्धन धर अतिसय रसिक वृषभानु कुँवारी।।
       कृष्ण की रास-लीला में प्रवेश पाकर उस रस का प्रत्यक्ष रूप से आस्वादन करना कृष्णदास की साधना का एक मात्रा लक्ष्य था। किन्तु वार्ताओं में उनकी अंत की स्थिति का जो वर्णन उपलब्ध होता है उससे यही पता चलता है कि उन्हें इस जीवन में यह लक्ष्य प्राप्त न हो सका। यही कारण है की इस चाह को अभिव्यंजित करने वाले पदों में एक भक्त की भावना अधिक लक्षित होती है;
                 हरिमुख देखे ही जीजै। 
                 सुनहु   सुन्दरी   नैन   सुभग   पुट   स्याम   सुधा   पीजै।।
                 न करि विलम्ब रसिक मनोहर गति पलु पलु सुख छीजै। 
                 बासर   केलि   नवल  जोबन  धन  बिलसि  लाभ   लीजै।।
                 गिरिधर  लाल  उरझि   बीथिन   में   बर   भूषन   कीजै। 
                 पद्मराग      रज    कृष्णदास    को     न्यौछावर     दीजै।।

साभार स्रोत :

  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय :डॉ दीनदयाल गुप्त 
  • हिन्दी  साहित्य का इतिहास;आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 

गुरुवार, 15 जून 2017

कुम्भनदास

  By : अशर्फी लाल मिश्र

                                                         अशर्फी लाल मिश्र                                                                              
                                                           कुम्भनदास 

                                                                       
जीवन परिचय : कुम्भनदास की  आचार्य वल्लभ के प्रमुख शिष्यों में गणना की जाती है। वार्ताओं के अनुसार कुम्भनदास श्रीनाथ के प्राकट्य के समय १० वर्ष के थे। श्री नाथ जी का प्राकट्य वि० सं० १५३५ है इस आधार पर इनका जन्म संवत १५२५ विक्रमी ठहरता है। डा० दीनदयाल गुप्त ने इनकी मृत्यु १६३९ विक्रमी स्वीकार की है। (अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय :पृष्ठ २४८ )
           कुम्भनदास का जन्म ब्रज में ही रहने वाले गोरवा क्षत्रिय घराने में हुआ। आर्थिक दृष्टि से आप सम्पन्न न थे। थोड़ी सी जमीन जीविका निर्वाह के लिए थी। किन्तु इतने पर भी किसी का दान लेने में संकोच होता था। इसीलिये महाराजा मान  सिंह के स्वयं  देने पर भी इन्होने कुछ भी स्वीकार नहीं किया।
          कुम्भनदास स्वभाव से सरल पर स्पष्टवादी थे। धन अथवा मान-मर्यादा की इच्छा इन्हें छू तक न गई थी। अकबर ने फतहपुर सीकरी बुलाकर इनका अत्यधिक सम्मान किया। पर श्रीनाथ जी के दर्शनों के अभाव में वहाँ इन्हें अत्यधिक दुख हुआ। इस बात की अभिव्यक्ति कुंभनदास ने अपने निम्न पद में की है :
                     संतन को कहा सीकरी सों काम। 
                     आवत    जात  पनहियाँ   टूटी,  बिसरि  गयो  हरि   नाम।।
                     जिनको मुख देखे दुख उपजत,तिनको करनी पड़ी सलाम।
                     कुंभनदास     लाल   गिरधर   बिनु   और   सबै    बेकाम।।
          गोकुलनाथ रचित वार्ताओं से स्पष्ट है कि कुम्भनदास,श्रीनाथ जी के एकांत सखा थे। अतः उनकी सभी लीलाओं में ये साधिकार भाग लेते थे। पर इनकी विशेष आसक्ति कृष्ण की किशोर-लीलाओं के प्रति थी।

काव्य-रचना :
*स्फुट पद (वर्षोत्सव ग्रंथों में ) विद्या-विभाग कांकरोली में पाण्डुलिपि उपलब्ध।

माधुर्य भक्ति :
         कुम्भनदास के आराध्यदेव श्रीकृष्ण हैं। वे वास्तविक रूप में जगत के स्रष्टा ,पालक और संहारक हैं। इसीलिये समस्त संसार उनकी पद-वन्दना करता है। वे लीला के लिए नाना प्रकार के अवतार धारण कर भक्तों की रक्षा करते है और अपनी विविध लीलाओं का विस्तार कर उन्हें आनन्दित  करते हैं। मधुर-लीलाओं के विस्तार के लिए श्रीकृष्ण की आदि रस-शक्ति राधा उनका सदा साथ देती हैं। इन दोनों की सुन्दरता,गुण और प्रेम अद्वितीय हैं। अतएव राधा-कृष्ण की जोड़ी भक्तों के लिए सदा  धेय है।
                    बनी राधा गिरधर की जोरी। 
                    मनहुँ परस्पर कोटि मदन रति की सुन्दरता  चोरी।।
                    नौतन  स्याम  नन्दनन्दन ब्रषभानु सुता नव गोरी। 
                     मनहुँ  परस्पर बदन चंद को पिवत  चकोर चकोरी। 
                    मनहुँ परस्पर बढ्यो रंग अति उपजी प्रीति न थोरी।।
        राधा के लिए कुम्भनदास ने कई स्थलों पर स्वामिनी शब्द का व्यवहार किया है जिससे ज्ञात होता है कि वे राधा को कृष्ण की स्वकीया मानते थे। राधा के अतिरिक्त गोपियाँ भी कृष्ण को पति रूप से  चाहती हैं। गोपियों का कृष्ण  प्रति प्रेम आदर्श प्रेम है। कृष्ण की रूप माधुरी और मुरली माधुरी से मुग्ध हो वे अपना सभी कुछ कृष्ण-चरणों में न्यौछावर कर देती हैं। तब उनकी यही एक मात्र कामना है कि हमें कृष्ण पति-रूप  से प्राप्त हो जाएँ। इसके लिए वे लोगों का उपहास भी सहने को भी प्रस्तुत हैं:
                     हिलगनी कठिन है या मन की। 
                     जाके  लिए  देखि  मेरी सजनी  लाज जान  सब तन की।। 
                     धर्म  जाउ  अरु  हँसो  लोग  सब  अरु  आवहु कुल गारी। 
                     तोऊ   न  रहे   ताहि   बिनु  देखें  जो  जाको   हितकारी।।
                     रस लुब्धक एक निमेष  न छाँड़त ज्यों अधीन मृग गाने। 
                     कुम्भनदास   सनेहु   मरमु   श्री   गोवर्द्धन   धार   जाने।।
         इसी कारण गोपियाँ सदा कृष्ण-दर्शन के लिए लालायित रहती हैं। उनके इस तीव्र प्रेम को देखकर कृष्ण यथावसर साथ  हास-परिहास करके उन्हें अपना स्पर्श-सुख प्रदान  हैं:
                     नैननि टगटगी लागि रही। 
                     नखसिख   अंग  लाल   गिरधर  के   देखत  रूप   बही।।
                    प्रातःकाल   घर  ते  उठि  सुन्दरि  जात  ही  बेचन दही। 
                    ह्वै  गई  भेंट  स्याम  सुन्दर  सों  अधभर पथ बिच ही।
                     घर व्यौहार सकल सुधि भूली ग्वालिन मनसिज दही। 
                    कुंभनदास    प्रभु  प्रीति  बिचारी  रसिक  कंचुकी   गही।।
         प्रेम-लीला के पदों में संयोग और वियोग दोनों पक्षों का वर्णन है। संयोग के पदों में सुरतान्त छवि, संभोग-सुख हर्षिता,अभिसारिका तथा मानिनी नायिका का वर्णन विशेष है। संभोग-हर्षिता नायिका के इस चित्रण में कवि ने व्यंजनापूर्ण शैली का प्रयोग किया है:
                    मिले की फूलि नैना कहि देत। 
                    स्याम  सुन्दर  मुख  चुंबन परसें नाचत मुदित अनेरे।।
                    नन्दनन्दन   पै   गये   चाहत  हैं,  मारग  श्रवननु घेरे। 
                    कुम्भनदास प्रभु गिरधर रस भरे करत चहूँ दिस फेरे।।
        संयोग के पदों की अपेक्षा कुम्भनदास के वियोग के पदों में अधिक संवेदनशीलता है। इन्हें पढ़ कर यही लगता है कि वियोग-भावना में कवि का मन अधिक रमता है। श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने पर उनकी क्रीड़ाओं का स्मरण करते हुए गोपी अपने उद्गारों को जिस रूप में प्रगट करती हैं ,उसमें निश्चय ही प्रभावित करने की शक्ति है :
                    कहा करों वह सुरति मेरे जिय ते न टरई। 
                    सुन्दर  नंद  कुँवर  के  बिछुरे  निस  दिन नींद न परई।।
                    बहु बिधि मिलनि प्रानप्यारे की एक निमेष न बिसरई। 
                    वे गुन समुझि समुझि चित नैननि नीर निरन्तर ढरई।।
                    कछु  न  सुहाय  तलाबेली  मनु बिरह अनल तन जरई। 
                    कुंभनदास   लाल   गिरधर  बिनु  समाधान  को  करई।।

साभार स्रोत :

  • अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय :डॉ दीनदयाल गुप्त 
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • विद्या-विभाग कांकरोली में पाण्डुलिपि उपलब्ध

              

भार्गव राम (खण्डकाव्य)-अशर्फी लाल मिश्र

 लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।© अशर्फी लाल मिश्र (1943-----) भार्गव राम (परशुराम ) अनुक्रमणिका :  1-  भार्गव राम - 1 2 -  भार्गव ...