मंगलवार, 30 मई 2017

सरसदास

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                               अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
       सरसदास  हरिदासी सम्प्रदाय के भक्त कवि एवं  पंचम आचार्य थे। ये नागरीदास के छोटे भाई तथा बंगाल के राजा के मंत्री कमलापति के दूसरे पुत्र थे। इनका जन्म   वि ० सं ० १६११ में गौड़ ब्राह्मण कुल में हुआ था। ये स्वभाव  से विरक्त थे अतः अपने बड़े भाई नागरीदास के साथ ही वृन्दावन आ गए और बिहारिनदेव से दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के उपरान्त शेष जीवन वृन्दावन में ही व्यतीत हुआ। वि ०  सं ० १६७० में अपने बड़े भाई नागरीदास के परलोक-गमन के उपरान्त ये टट्टी संस्थान की गद्दी पर बैठे। वि ० सं ० १६८३ में इनका देहावसान हो गया।

रचनाएँ :
इनके पद ,कवित्त और सवैये स्फुट रूप में उपलब्ध हैं। इनकी समस्त वाणी सिद्धांत के पद और श्रृंगार के पद दो   भागों में विभक्त है।

माधुर्य भक्ति :
           सरसदास के उपास्य श्यामा-श्याम आनंदनिधि ,सुखनिधि गुणनिधि और लावण्य-निधि हैं।  ये सदा   प्रेम में मत्त  में लीन  रहते हैं। राधा-कृष्ण के इसी  विहार का ध्यान सरसदास की उपासना है। किन्तु यह उपासना सभी को सुलभ नहीं है। स्वामी हरिदास जिस पर कृपा करें वही  प्राप्त कर सकता है।
           राधा-कृष्ण  विविध लीलाओं में से सरसदास ने झूलन ,नृत्य ,जल-विहार ,रति आदि सभी  वर्णन किया है किया है। अपनी प्रिया को प्रसन्न करने के लिए उसका श्रृंगार करते हुए कृष्ण का यह वर्णन भाव और भाषा की  दृष्टि से उत्तम :
                     लाल प्रीया को सिंगार बनावत। 
                     कोमल   कर  कुसुमनि कच गुंथत मृग मद आडर चित सचुपावत।।
                     अंजन   मनरंजन   नख   वरकर    चित्र   बनाइ   बनाइ   रिझावत। 
                     लेत   वलाइ   भाई  अति   उपजत   रीझि  रसाल  माल पहिरावत।।
                     अति  आतुर  आसक्त दीन  भये चितवत कुँवर कुँवरी  मन भावत। 
                      नैननि में में मुसक्याति जानि प्रिय प्रेम विवस हसि कंठ लगावत। 
                      रूपरंग      सीवाँ     ग्रीवाँ   भुज   हसत   परस्पर   मदन   लड़ावत। 
                      सरसदास सुख निरखि निहाल भये गई निसा नव नव गुन गावत।।
            इसी प्रकार राधा-कृष्ण के  जल-विहार का निम्न सरस वर्णन ;
                       विहरत जमुना जल सुखदाई। 
                      गौर स्याम अंग अंग मनोहर चीरि चिकुर छवि छाई।।
                       कबहुँक रहसि वरसि हसि धावत प्रीतम लेत मिलाई। 
                      छिरकत   छैल  परस्पर छवि सौं कर अंजुली छुटकाई।।
                       महामत्त   जुगवर   सुखदायक   रहत   कंठ लपटाई। 
                       क्रीडति कुँवरि कुँवर  जल थल मिलि रंग अनंग बढ़ाई।।
                       हाव   भाव   आलिंगन   चुंबन   करत  केलि  सुखदाई। 
                       भीजे    वसन    सहचरी    नऊ   तन   चित्र       बनाई।।
                       रचे  दुकूल  फूल अति  अंग अंग  सरसदास बलि जाई।।
             सरसदास की दृष्टि में उपास्य युगल की सेवा करना ही उपासक का श्रेष्ठ-धर्म है। स्वामी हरिदास की  प्रशस्ति में गाये  गए इस कवित्त से उनकी इस साधना पर प्रकाश पड़ता है :
                        विविध वर माधुरी सिंधु में मगन मन ,
                                     वसत   वृन्दाविपुन   वर   सुधामी। 
                        महलनि जु टहल में सहल पावै न कोउ ,
                                     छत्रपति   रंक   जिते   कर्म  कामी।।
                        रसिक रसरीति की रीति सों प्रीति नित ,
                                      नैन    रसना   रसत   नाम    नामी। 
                        हृदै -कमल मद्धिय सुख सेज राजत दोऊ ,
                                     रसिक सिरमौर श्री हरिदास स्वामी।।
                      
    साभार स्रोत :

  • ब्रजभाषा के कृष्ण-काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  •   सरसदास  की वाणी           

नागरीदास

By  : अशर्फी लाल मिश्र 
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
         नागरीदास हरिदासी सम्प्रदाय के चतुर्थ आचार्य भक्त कवि हैं। महन्त किशोरीदास के अनुसार आप का जन्म वि ० सं ० १६०० में हुआ। इसकी पुष्टि महन्त  किशोरी दास द्वारा निजमत सिद्धान्त के निम्न दिए उद्धरण  से होती है :
                       
                           सम्वत सोरह सै तनु धाऱयो। महा शुक्ल पंचमी बिचारयो।। 
ये तत्कालीन बंगाल  राजा के मंत्री कमलापति के पुत्र थे। ऐसा  है कि इनके  पिता पुनः प्राण-दान देने के कारण बिहारिनदेव जी का अपने ऊपर बहुत ऋण मानते थे। उसी ऋण से मुक्त होने के लिए उन्होंने अपने दो विरक्त  साधू  स्वभाव के पुत्रों को वृन्दावन  स्थित  श्री बिहारिनदेव की चरण-शरण में  भेज दिया। इन पुत्रों में बड़े नागरीदास और छोटे सरसदास थे।
          नागरीदास का सम्बन्ध गौड़ ब्राह्मण जाती से है किन्तु इनके जन्म स्थान आदि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कुछ भी पता नहीं है। लेकिन इनके पिता बंगाल के राजा के मंत्री थे इस आधार पर इनका जन्म बंगाल माना जा सकता है। बिहारिनदेव का शिष्यत्व स्वीकार कर लेने पर शेष जीवन वृन्दावन में बीता। दीक्षा ग्रहण  समय इनकी आयु २२ वर्ष की थी और ४ ८  वर्ष  का समय  इन्होंने वृन्दावन में भजन-भाव में व्यतीत किया। इस आधार पर इनका परलोक गमन  का समय वि  सं ० १६७० माना जा सकता है।

रचनाएँ :
        नागरीदास के स्फुट पद ,कवित्त ,सवैये आदि वाणी में संकलित हैं।


माधुर्य भक्ति :
              नागरीदास के उपास्य श्यामा-श्याम नित्य-किशोर ,अनादि ,एकरूप और  रसिक हैं। ये सदा विहार में लीन रहते हैं। इनका यह विहार निजी सुख के लिए नहीं ,दूसरे की प्रसन्नता के लिए है। अतः यह विहार नितांत शुद्ध है। इसके आगे काम का सुख कुछ भी नहीं है :
                       राग  रंग  रस   सुख   बाढ्यो   अति   सोभा   सिंध   अपार। 
                       विपुल    प्रेम   अनुराग  नवल   दोउ   करत  अहार   विहार।।
                      श्री वृन्दाविपुन विनोद करत नित छिन छिन प्रति सुखरासि। 
                       काम   केलि   माधुर्य   प्रेम   पर   बलि   बलि   नागरिदासि।।
            नागरीदास ने राधा-कृष्ण के इस नित्य-विहार का वर्णन विविध रूपों में किया है। निम्न पद में में राधा-कृष्ण के जल विहार का वर्णन दृष्टव्य है :
                      विहरत जमुना जल जुगराज। 
                      श्री वृन्दाविपुन विनोद सहित नवजुवतिन जूथ समाज।।
                       छिरकत  छैल   परस्पर  छवि  सों सखी सम्पति साज। 
                       नवल  नागरीदास   श्री  नागर   खेलत मिले चलै भाज।।
           कहीं -कहीं इन्होंने लीला वर्णन में रूपात्मक शैली का भी प्रयोग किया है :
                       खेलत चतुर चौंप चौगान। 
                       मंदिर     नवल      निकुंज      विराजत   नवरंग    मदन    मैदान।।
                      मन   तुरंग   गुन   कटाछनि    दृग   टोलनि  कुच   ढीह  पर   बान। 
                       होति तहाँ सरस प्रेम परस्पर रीझि सखी नागरीदास पर वारौं प्रान।।
           नागरीदास के विचार में नित्य विहार की साधना सरस होते हुए भी सरल नहीं है क्योंकि इसमें जरा सी भी असावधानी से पतन की सम्भावना बनी रहती है।
                       नित्य विहार सार सब को अति दुर्लभ अगम अपार। 
                       अनन्य धर्म संधि समुझे बिन माया कठिन किवार।।
साभार स्रोत:
* नागरीदास की वाणी
*ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७

शनिवार, 27 मई 2017

बिहारिनदेव

By :अशर्फी लाल मिश्र
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

जीवन परिचय :
                बिहारिनदेव हरिदासी सम्प्रदाय के श्रेष्ठ आचार्य एवं कवि  हैं। ये विट्ठलविपुलदेव के शिष्य थे। विहारिनदेव  अपने गुरु विट्ठलविपुलदेव की मृत्यु के पश्चात् टट्टी संस्थान की आचार्यगद्दी पर बैठे। विट्ठलविपुलदेव की मृत्यु वि ० सं ० १६३२ है अतः विहारिनदेव का जन्म संवत  इस संवत के आसपास माना  जा सकता है।
                 विहारिनदेव दिल्ली-निवासी थे। इनका जन्म शूरध्वज ब्राह्मण कुल में हुआ था। इनके पिता मित्रसेन अकबर के राज्य-सम्बन्धी कार्यकर्ताओं में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। अपने शील-स्वभाव के कारण  मृत्यु के उपरान्त विहारिनदेव को भी अपने पिता का सम्मानित पद प्राप्त हो गया किन्तु ये स्वभाव से विरक्त थे ,अतः युवावस्था में ही घर छोड़ कर वृन्दावन  आ गये और वहीं भजन भाव में लीन  होकर रहने लगे। इनकी रस-नीति , विरक्ति और शील-स्वभाव का वर्णन केवल हरिदासी सम्प्रदाय के भक्त कवियों ने नहीं ,अपितु अन्य सम्प्रदाय  के भक्तों ने भी क्या है।
                विहारिनदेव का महत्व अपने सम्प्रदाय में अत्यधिक है। हरिदासी सम्प्रदाय के यही प्रथम आचार्य हैं जिन्होंने संप्रदाय के उपासना सम्बन्धी सिद्धांतों को विशद रूप से प्रस्तुत किया। रस-रीति की तीव्र अनुभूति के कारण इनके प्रतिपादित सिद्धान्त बहुत स्पष्ट हैं ,और इसीलिए ाहज-गम्य हैं। इनके प्रतिपादित सिद्धान्तों की नींव पर आज हरिदासी सम्प्रदाय का विशाल भवन स्थिर है।

रचनाएँ :
विहारिनदेव की वाणी निम्न दो भागो में विभक्त है :
  • सिद्धान्त के दोहे ( लगभग ८०० )
  • शृंगार के पद (लगभग ३०० )
 माधुर्य भक्ति :
            विहारिनदेव  के उपास्य श्यामा-श्याम अजन्मा ,नित्य-किशोर तथा नित्य विहारी हैं। इनका रूप, भाव और वयस समान हैं। यद्यपि इनकी विहार लीला अपनी रूचि के अनुसार होती है किन्तु उनका उद्देश्य प्रेम  प्रकाशन है। अतः भक्त इन विहार लीलाओं का चिन्तन एवं भावन करके प्रेम का आस्वादन करते हैं। 
           विहारिनदेव   ने अपने उपास्य-युगल राधा-कृष्ण की प्रेम लीलाओं  वर्णन अपनी काव्य-रचना में बहुत सुन्दर दंग से किया है। इनमें मान, भोजन ,झूलन ,नृत्य ,विहार आदि सभी लीलाओं का समावेश है। मान का त्याग कर अपने प्रियतम को सुख देने के लिए जाती हुई राधा का यह वर्णन बहुत सरस है ;
              विगसे  मुखचन्द्र  अनंद  सने  सचिहार  कुचै  विच भाँति अली। 
             उतते रस राशि  हुलास हिये इत  चोप  चढ़ी  मिलि श्याम अली।।
             सुविहारी  बिहारिनिदासि  सदा  सुख  देखत  राजत  कुंज  अली। 
             तजि मान अयान सयान सबै यह लाल को ललना सुख दैन चली।।
       निशि-विहार के उपरान्त प्रातःकाल सखियाँ कृष्ण की दशा देखकर सब रहस्य जान गईं,किन्तु कृष्ण नाना प्रकार से उस रहस्य को छिपाने का प्रयत्न करते हैं। कवि द्वारा कृष्ण की सुरतान्त छवि का सांगोपांग चित्रण :
            आज क्यों मरगजी उरमाल। 
            देखिये विमल कमल नयन युगल लगत न पलक  प्रवाल। 
            अति    अरसात   जम्हात  रसमसे  रस छाके   नव  बाल।।
            अधर  माधुरी  के  गुण  जानत  वनितन  वचन  रस ढाल। 
            फबें न पेंच सुदृढ़ शिथिल अलक बिगलित कुसुम गुलाल।।
           विवश  परे  मन  मनत   आपने   रंग  पग   भूषण   माल। 
           सखिदेत   सब    प्रगट   पिशुन  तन  काहे  दुरावत  लाल।।
           अब  कछु  समुझि   सयान   बनावत   बातें  रचित रसाल। 
           बिहारीदास पिय   प्रेम प्रिया वश बसे हैं कुंज निशि ब्याल।।
      मधुर रस परिपाक की दृष्टि से यह  है :
               हँसि मिलिवो मेरे जिय ते न टरई। 
              सहज  चिते  चित   चोर  परस्पर   प्रेम  बचन  सरस  सुर ढरई।।
             मदन   मुदित  बंद   ही बंद छोरत उर जोरत मुख पर मुख धरई। 
            परम  कृपाल  रसाल  लाड़िली  लाले  लटकि  लपटि  भुज   भरई।।
             प्यारी  जू  प्राणनाथ  रस विलसत श्रम जलकन बरसत मन हरई। 
           श्री बिहारिनिदासि अंचल चंचल कर यह अवसर आनन्द अनुसरई।।
       राधा-कृष्ण की नित्य विहार-परक लीलाएँ अपने सभी रूपों में भक्त के लिए सुखद हैं अतः उसकी यही अभिलाषा है कि वह इस प्रकार की आनन्द प्रद लीलाओं को नित्य-प्रति देखा करे :
             अंगन  संग  लसें  विलसँ   परसे  सुख  सिंधु न प्रेम अघैहौं। 
             रूप  लखें  नित  माधुर  वैन  श्रवन्न  सु चैन सुनें गुण गैहौं।।
             दंपति  संपति संचि हिये धरि या सुख ते न कहूँ चलि जैहौं। 
             नित्य विहार अधार हमार बिहारी बिहारिनि की बलि जैहौं।।

साभार स्रोत :

  •   ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  •    विहारिनदेव की वाणी        

शुक्रवार, 26 मई 2017

विट्ठलविपुल देव

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
          विट्ठलविपुल देव  की हरिदासी सम्प्रदाय में प्रमुख भक्त कवियों में गिनती की जाती है। ये  स्वामी हरिदास के मामा  के पुत्र थे। हरिदासी सम्प्रदाय के विद्वानों के अनुसार ये स्वामी हरिदास से आयु में कुछ बड़े थे और इनकी मृत्यु स्वामी जी की मृत्यु के एक वर्ष बाद हुई। इसलिए ये स्वामी जी के समकालीन  हैं। इनका निधन-काल वि ० सं ० १६३२ मन जा सकता है । इनका जन्म कहाँ हुआ यह निश्चित नहीं है लेकिन यह सर्वसम्मत है कि  स्वामी हरिदास के जन्म के बाद आप उनके पास राजपुर में ही रहते थे और स्वामी जी के विरक्त होकर वृन्दावन आ जाने पर आप भी वृन्दावन आ गये। आयु में बड़े होने पर भी स्वामी हरिदास का शिष्यत्व स्वीकार किया। ये बाल्यकाल से ही स्वामी जी से प्रभावित थे और उन्हें एक महापुरुष मानते थे। स्वामी जी  की मृत्यु के उपरान्त ये टट्टी संस्थान की गद्दी पर बैठे किन्तु स्वामी जी के वियोग की भावना इतनी प्रवल थी एक वर्ष बाद ही इनका परलोक गमन हो गया।

रचनाएँ :

  •  चालीस स्फुट  पद  एवं कवित्त 
माधुर्य भक्ति :

          विट्ठलविपुल देव के उपास्य श्यामा-श्याम परम रसिक हैं। ये नित्य -किशोर  सदा विहार में लीन  रहते हैं। इनकी वह निकुंज-क्रीड़ा  काम-केलि रस-पागी होने पर प्रेम-परक होने के कारण सदा भक्तों का मंगल विधान करती है। यद्यपि सामान्य से राधा और कृष्ण को विट्ठलविहारी देव ने नित्य विहारी स्वीकार किया है ,किन्तु कुछ लीला परक पदों में उनका स्वकीया सम्बन्ध भी सूचित होता है :

मिलि खेलि मोहन सो करि मनभायो। 
कुंज बिहारीलाल रसबस बिलसत मेरे तन मन फूलि अपनो कर पायो।।
तुम  बिन   दुलहिन   ए   दिन   दूलह   सघन  लता   गृह मंडप छायो। 
कोकिल  मधुपगन  परेगी  भाँवरी  तहाँ  श्री विट्ठलविपुल मृदंग बजायो।। (विट्ठलविपुल देव की वाणी ;पद ३१ )

           उपास्य -युगल की लीलाओं का गान एवं ध्यान ही इनकी उपासना है। अतः इन्होंने राधा-कृष्ण की प्रातःकाल से निशा-पर्यन्त होने वाली सभी लीलाओं का गान अपनी वाणी में किया है। इनमें से वन-विहार ,झूलन, वीणा -वादन-शिक्षा आदि लीलाएं उल्लेखनीय हैं। जिनकी बाँसुरी की तान सुनकर चार,अचर  सभी मोहित हो जाते हैं। उन्हीँ कृष्ण को वीणा सिखाती हुई राधा का  यह वर्णन  भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से सुन्दर है :

प्यारी पियहि सिखावति बीना। 
ताल  बंध्यान   कल्यान  मनोहर  इत  मन  देह प्रवीना।।
लेति सम्हारि- सम्हारि सुघरवर नागरि कहति फबीना। 
श्री विट्ठलविपुल  विनोद   बिहारी कौ जानत भेद कवीना।। (विट्ठलविपुल देव की वाणी ;पद २९)
               इसी प्रकार निम्न पद में कवि ने राधा की निशि-विहार के बाद की छवि का सफल चित्रण किया है:

प्रिया स्याम संग जागी है। 
सोभति कनक-कपोल ओप पर दसन-छाप-छवि लागी है।। 
अधरन  रंग  छुटी  अलि  को  वल सुरति रंग अनुरागी है। 
श्री  विठ्ठलविपुल कुंज  की  क्रीड़ा काम-केलि-रस पागी है।। ((विट्ठलविपुल देव की वाणी ;पद ७ )

साभार स्रोत :

  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:  :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • विट्ठलविपुल देव की वाणी



          

बुधवार, 24 मई 2017

स्वामी हरिदास : हरिदासी सम्प्रदाय के संस्थापक



By : अशर्फी लाल मिश्र
अशर्फी लाल मिश्र 
                                                                                                                   
स्वामी हरिदास 
                                                           

जीवन परिचय :
हरिदासी सम्प्रदाय के संस्थापक स्वामी हरिदास की गणना ब्रज भाषा के प्रमुख भक्त कवियों में की  जाती है । उनकी भजन भावना और विरक्ति के विषय में कई समकालीन तथा परवर्ती कवियों ने उल्लेख किया है किन्तु इनके जन्म-संवत ,जन्म-स्थान ,जाति ,कुल, गुरु आदि का उल्लेख  किसी  भी समकालीन कवि या लेखक ने अपनी रचना में  नहीं किया। इसलिए आज इनके जन्म-संवत आदि के सम्बन्ध में निश्चित रूप से कहना  कठिन है.
            स्वामीजी के जन्म के सम्बन्ध में दो मत प्रचलित हैं। पहले मत के पोषक हैं वृन्दावनस्थ  बांके  बिहारी  मंदिर के गोस्वामियों  के अनुसार  स्वामी जी वि ० सं ० १५६९ में अलीगढ जिले के अंतर्गत हरिदास नामक ग्राम में उत्पन्न हुए थे। इनके अनुसार स्वामीजी का जन्म गर्ग गोत्रीय सारस्वत ब्राह्मण कुल में हुआ था। दूसरे मत के अनुसार स्वामी जी जन्म वि ० सं ० १५३७ में वृन्दावन  से १. ५  किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजपुर ग्राम के एक सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था।
            स्वामी हरिदास की मृत्यु ९५ वर्ष की अवस्था में हुई इससे दोनों मतों के विद्वान सहमत हैं। वि ० सं ० १५६९ में जन्म मानने  वालों के अनुसार स्वामी जी की मृत्यु वि ० सं ० १६६४ और दूसरे मत के अनुसार वि ० सं ० १६३१।
            स्वामी जी के परम्परानुयायी  विद्वान आशुधीरदेव जी को स्वामी जी का गुरु स्वीकार करते  हैं। इस मत की पुष्टि टट्टी संस्थान के छठे आचार्य रसिकदेव के इस श्लोक से हो जाती है :
                     अशुधीरस्य शिष्यों यो हरिदासः प्रकीर्तितः। 
                     अनन्याधिपतिः श्रीमान गुरुणांच गुरुः प्रभुः।।

रचनाएँ :

  1. सिद्धांत  (अठारह पद )
  2. केलिमाल (माधुर्य भक्ति का महत्वपूर्ण ग्रन्थ )
माधुर्य भक्ति :
          स्वामी  हरिदास के  उपास्य युगल राधा-कृष्ण ,नित्य-किशोर ,अनादि एकरस और एक वयस हैं। यद्यपि ये स्वयं प्रेम-रूप हैं तथापि भक्त को को प्रेम का आस्वादन कराने के लिए ये नाना प्रकार की लीलाओं का विधान करते हैं। इन लीलाओं का दर्शन एवं भावन करके जीव अखण्ड   प्रेम का आस्वादन करता है।
' कुञ्ज बिहारी बिहारिनि जू को पवित्र रस '~~ 
कहकर स्वामी जी स्पस्ट सूचित किया है कि राधा-कृष्ण का विहार अत्यधिक पवित्र है। उस विहार में प्रेम की लहरें उठती रहती हैं,जिनमें मज्जित होकर जीव आनन्द में विभोर हो जाता है। इस प्रेम की प्राप्ति उपासक विरक्त भाव से वृन्दावन-वास करते हुए भजन करने से हो सकती है। स्वामी हरिदास जी का जीवन इस साधना का मूर्त रूप कहा जा सकता है। 
                      राधा -कृष्ण की इस  अद्भुत  मधुर-लीला  का वर्णन स्वामी हरिदास ने  वन -विहार ,झूलन ,नृत्य आदि   विभिन्न रूपों में किया है। इस लीला का महत्व संगीत की दृष्टि से अधिक है। नृत्य का निम्न वर्णन दृष्टव्य है :
                             अद्भुत गति उपजत अति नाचत ,
                             दोउ मंडल कुँवर किशोरी। 
                             सकल सुधंग अंग अंग भरि भोरी ,
                              पिय नृत्यत मुसकनि मुखमोरि परिरंभन रस रोरी।। (केलिमाल :कवित्त ३४ )
                      रसिक भक्त होने के कारण राधा-कृष्ण की लीलाओं को ही वह अपना सर्वस्व समझते हैं और सदा यही अभिलाषा करते हैं ~~
                               ऐसे   ही    देखत   रहौं   जनम   सुफल   करि   मानों। 
                               प्यारे की भाँवती भाँवती के प्यारे जुगल किशोरै जानौं।।
                               छिन  न  टरौं   पल  होहुँ  न  इत  उत  रहौं एक तानों। 
                              श्री हरिदास के स्वामी स्यामा 'कुंज बिहारी 'मन रानौं।।(केलिमाल :पद ३ )
               
                    स्वामी हरिदास ने केलिमाल में केवल राधा-किशन की विविध लीलाओं का वर्णन किया है।
 साभार स्रोत :

  •  ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • केलिमाल   


सोमवार, 22 मई 2017

कवि / सेवक ( दामोदरदास )

By :  अशर्फी लाल मिश्र
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

जीवन परिचय :
            भक्त कवि सेवक जी का राधावल्लभ सम्प्रदाय में प्रमुख स्थान है। इनका जन्म श्रेष्ठ ब्राह्मण कुल में गौंडवाने के गढ़ा नामक ग्राम में हुआ था । यह गढ़ा ग्राम  जबलपुर  से ३  किलोमीटर दूर स्थित है। इनके जन्म-संवत तथा मृत्यु-संवत के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी पता नहीं है। किन्तु विद्वानों के अनुसार अनुमानतः इनका जन्म वि ० सं ० १५७७ तथा मृत्यु वि ० सं ० १६१० में हुई। (राधावल्लभ सम्प्रदाय :सिद्धांत और साहित्य :डा ० विजयेंद्र स्नातक :पृष्ठ ३४९ )
        सेवक जी बचपन से ही भगवत अनुरागी जीव थे। अपने ही गाँव के एक सज्जन चतुर्भुजदास से इनकी परम मैत्री थी। एकबार वृन्दावन के कुछ रसिकों से इनका समागम हुआ और उनसे श्यामा-श्याम की केलि का सरस वर्णन सुनने को मिला। दोनों मित्र इस लीला गान से विशेष प्रभावित हुए और दोनों ने उन सन्तों  से अपनी गुरु-धारणा  की अभिलाषा प्रकट की। वृन्दावन रसिकों से श्री हित हरिवंश महाप्रभु के परम् रसिक होने का समाचार प्राप्त कर इन्होंने वृन्दावन जा उन्हीं से दीक्षा लेने का निश्चय किया। परन्तु वे गृहस्थी से जल्दी छूट न सके और इसी बीच  श्री महाप्रभु जी का देहांत हो गया। तदुपरांत चतुर्भुजदास तो वृन्दावन चले गए और वहाँ हित  गद्दी पर विराजमान श्री वनचंद्र जी से राधा-मन्त्र ग्रहण किया। परंति सेवक जी इसी निश्चय पर दृढ़ रहे कि मैं तो स्वयं श्री हित जी से ही दीक्षा लूँगा अन्यथा प्राण का परित्याग कर दूँगा। कुछ समय उपरान्त श्री हित महाप्रभु सेवक जी साधना और दृढ़ निश्चय पर रीझ गए और स्वप्न में राधा-मन्त्र दिया ,जिसके प्रभाव से श्यामा-श्याम केलि तथा वृन्दावन-वैभव इनके ह्रदय में स्वतः स्फुरित हो उठा। वृन्दावन माधुरी  के प्रत्यक्ष दर्शन करने के उपरान्त  इनकी वाणी में एक प्रकार की मोहकता आ गई और राधा-वल्लभ की नित्य नूतन-छवि का वर्णन करने लगे। कुछ समय बाद आप श्री वनचन्द्र  का निमन्त्रण पाकर वृन्दावन चले गए। वहाँ इनका विशेष सत्कार हुआ। इनकी वाणी से प्रभावित होकर वनचन्द्र जी ने श्री हित चौरासी और सेवक वाणी  साथ पढ़ने का आदेश दिया। (श्री हितामृत सिंधु :सेवक चरित्र :पृष्ठ ६ ८ )
 रचनाएँ :
*सेवक वाणी (दोहे ,कवित्त पद आदि स्फुट रूप में )

माधुर्य भक्ति :
        उपास्य के रूप में सेवक जी श्यामा-श्याम दोनों का एक साथ साथ स्मरण किया है। उनकी दृष्टि में दोनों अभिन्न हैं,एक के विना  दूसरे का  अस्तित्व ही नहीं। इसमें आराध्या श्यामा हैं और नित्य प्रति उनका नाम स्मरण करने वाले श्याम आराधक हैं। अपने इस उपास्य-युगल की छवि और स्वरुप का   वर्णन सेवक जी ने अपने पदों में  किया है। सेवक जी की   राधा सर्वांग-सुन्दरी  सहज माधुरी-युता तथा नित्य नई -नई  केलि का विधान रचने वाली हैं :
                      सुभग सुन्दरी सहज श्रृंगार। 
                      सहज शोभा सर्वांग प्रति सहज रूप वृषभानु नन्दिनी। 
                      सहजानन्द कदंबिनी सहज विपिन वर उदित चन्दनी।।
                      सहज   केलि  नित-नित   नवल   सहज रंग सुख चैन। 
                      सहज   माधुरी   अंग   प्रति   सु   मोपै   कहत   बनेंन।। (हितामृत सिंधु :सेवक वाणी :पृष्ठ १०४ )
            विविध आभूषणों से भूषित रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण का सौन्दर्य भी अपूर्व अथच दर्शनीय है:
                      श्याम सुन्दर उरसि बनमाल। 
                      उरगभोग भुजदण्ड  वर ,कम्बुकण्ठमनि-गन बिराजत। 
                     कुंचित कच मुख तामरस मधु लम्पट जनु मधुप राजत।।
                     शीश    मुकुट   कुण्डल     श्रवन ,  मुरली  अधर   त्रिभंग। 
                     कनक कपिस  पट शोभि  अति ,जनु  घन  दामिनी संग।। (हितामृत सिंधु:सेवकवाणी :पृष्ठ १०४ )
           उपास्य-युगल श्यामा-श्याम की प्रेम लीलाओं का   गान एवं ध्यान ही इनकी उपासना है। इन लीलाओं के प्रति रूचि उपासक में तभी आती है जब उसके ह्रदय  प्रीति का अंकुर फूट पड़ता है और इसका केवल हरिवंश कृपा है~~
                    सब जग देख्यो चाहि ,काहि कहौं हरि भक्त बिनु। 
                    प्रीति  कहूँ  नहिं  आहि , श्री  हरिवंश  कृपा  बिना।।
        श्री हरिवंश की कृपा हो जाने पर जीव सबसे प्रेम करने लगता है,शत्रुऔर मित्र में ,लाभ और  हानि में,मान और अपमान में  समभाव वाला हो जाता है। हरिवंश कृपा के परिणामस्वरूप वह  सतत श्यामा-श्याम के नित्य विहार का प्रत्यक्ष दर्शन करता है और इस लीला दर्शन से उसे जिस आनन्द की की अनुभूति होती है वह प्रेमाश्रुओं तथा पुलक द्वारा स्पष्ट सूचित होता है :
                     निरखत नित्य विहार ,पुलकित तन रोमावली। 
                     आनन्द  नैन  सुढार ,यह  जु  कृपा हरिवंश की। (हितामृत सिंधु:सेवकवाणी :पृष्ठ ११३ )
        रास के इस वर्णन में सेवक जी ने अवसर के अनुरूप उपयुक्त सभी हाव-भावों को सरस् भाषा में प्रस्तुत किया है :
                     वंश  रस  नाद   मोहित  सकल  सुन्दरी,
                     आनि   रति  मानि   कुल   छाँड़ि  कानी। 
                     बाहु   परिरंग   नीवी   उरज  परसि हँसि,
                     उमंगि   रति   पति   रमित  रीति जानी।।
                     जूथ जुवतिन खचित ,रासमण्डल रचित,
                     गान       गुन       निर्त      आनन्ददानी।।
                     तत्त थेई -थेई करत,गतिव नौतन धरत,
                     रास     रस     रचित     हरिवंश     बानी।।(हितामृत सिंधु:सेवकवाणी :पृष्ठ ९३ )
         उपासक के स्वरुप तथा उपासक-धर्म की दृष्टि से सेवक जी का निम्न छप्पय बहुत सुन्दर है। इसमें संक्षेप में उपासक के साधना-क्रम का उल्लेख करते हुए सखी भाव से राधा-कृष्ण की सेवा का संकेत किया गया है :
                       पढ़त   गुनत   गुन   नाम   सदा   सत  संगति पावै। 
                       अरु   बाढ़ै   रस   रीति   विमल   बानी   गुन    गावै।।
                       प्रेम   लक्षणा     भक्ति    सदा    आनंद    हितकारी। 
                       श्री  राधा  युग   चरन    प्रीति   उपजै   अति    भारी।।
                       निज महल टहल  नवकुंज में नित सेवक सेवा करनं। 
                       निशदिन समीप संतत रहे सु श्री हरिवंश चरण शरणं।।हितामृत सिंधु:सेवकवाणी :पृष्ठ १२६  )
साभार स्रोत :

  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • राधावल्लभ सम्प्रदाय :सिद्धांत और साहित्य :डा ० विजयेंद्र स्नातक 
  • श्री हितामृत सिंधु :सेवक चरित्र

रविवार, 21 मई 2017

नेही नागरीदास

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

जीवन परिचय :
            भक्त कवियों में नागरीदास नाम के तीन कवि विख्यात हैं ,परन्तु राधा-वल्लभ सम्प्रदाय के नागरीदास जी के नाम के पूर्व नेही उपाधि के कारण आप अन्य कवियों से सहज ही अलग हो जाते हैं। नागरीदास जी का जन्म पँवार क्षत्रिय कुल में ग्राम बेरछा (बुन्देलखंड ) में हुआ था। इनके जन्म-संवत का निर्णय समसामयिक भक्तों के उल्लेख से ही किया जा सकता है। इस आधार पर नागरीदास जी जन्म-संवत १५९० के आसपास ठहरता है।
          भक्ति की ओर नागरीदास जी की रूचि शैशव से ही थी। भक्त-जनों से मिलकर आपको अत्यधिक प्रसन्नता होती थी। एक बार सौभाग्य से स्वामी चतुर्भुजदास जी से आप का मिलाप हुआ।  इनके सम्पर्क से  रस-भक्ति का रंग नागरीदास जी को लगा और ये घर -परिवार छोड़कर  वृन्दावन चले आये। यहाँ आकर आपने वनचंद स्वामी से दीक्षा ली. (श्री हितहरिवंश गोस्वामी सम्प्रदाय  और साहित्य :गो ;पृष्ठ ४१७ )
इस प्रकार  रस-भक्ति में इनका प्रवेश हुआ।
       नेही नागरीदास जी हितवाणी और नित्य विहार में अनन्य निष्ठां थी। वे हितवाणी के अनुशीलन में इतने लीन रहते की उन्हें अपने चारों ओर  के वातावरण का भी बोध  न रहता। परन्तु इस प्रकार के सरल और अनन्य भक्त से  भी  कुछ  द्वेष किया और इन्हें विवस होकर वृन्दावन छोड़ बरसाने जाना पड़ा।इस   बात का  उल्लेख नागरीदास जी ने स्वयं किया है :
                          जिनके   बल   निधरक  हुते  ते  बैरी भये बान। 
                          तरकस के सर साँप ह्वै फिरि-फिरि लागै खान।।
नागरीदास जी राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रारम्भिक कवियों में गिने जाते हैं। ध्रुवदास जी  को जिस प्रकार सम्प्रदाय की रस-रीति को सुगठित बनाने का श्रेय है ,उसीप्रकार नागरीदास जी को उसके उपासना-मार्ग  को सुव्यवस्थित बनाने का गौरव प्राप्त है (श्री हितहरिवंश गोस्वामी   सम्प्रदाय  और साहित्य :गोस्वामी ललिता चरण गोस्वामी  :पृष्ठ ४२१ )
     
रचनाएँ ;


  1. सिद्धांत  दोहावली :९३५ दोहे  
  2. पदावली : पद १०२ 
  3. रस  पदावली ;(स्फुट पद सहित ) २३२ पद 
भक्ति माधुर्य :
            नागरीदास जी ने आत्म-परिचय के रूप में लिखे गए एक सवैये में अपने आराध्य ,अपनी उपासना और अपने उपासक- धर्म  का सुन्दर दंग से उल्लेख किया है:
                       सुन्दर श्री बरसानो निवास और बास बसों श्री वृन्दावन धाम है। 
                       देवी  हमारे  श्री  राधिका  नागरी  गोत  सौं श्री  हरिवंश  नाम है।
                       देव  हमारे  श्रीराधिकावल्लभ  रसिक  अनन्य  सभा  विश्राम है। 
                       नाम है नागरीदासि अली वृषभान लली  की  गली को गुलाम है।
             इस सवैये से कि नेही जी के आराध्य राधा और कृष्ण हैं। कृष्ण का महत्व राधिकावल्लभ के रूप में ही अंगीकार किया गया है। स्वयं नागरीदास जी वृषभान लली की  गली को गुलाम  हैं। नागरीदास जी की  निष्ठां एवं अनन्यता अत्यधिक तीव्र थी। अपने राधाष्टक में आपने राधा और श्री हितहरिवंश के अतिरिक्त किसी और  को स्वीकर नहीं किया है। इसी कारण राधाष्टक की राधावल्लभ सम्प्रदाय में अत्यधिक मान्यता है ~~ 
                      रसिक     हरिवंश    सरवंश   श्री     राधिका ,  सरवंश    हरवंश    वंशी। 
                      हरिवंश   गुरु  शिष्य   हरिवंश  प्रेमवाली हरिवंश धन धर्म राधा प्रशंसी।
                      राधिका     देह      हरिवंश     मन ,   राधिका      हरिवंश     श्रुतावतंशी। 
                      रसिक जन मननि आभरन हरिवंश हितहरिवंश आभरन कल हंस हंसी।। 
              राधा और हितहरिवंश में इस प्रकार की दृढ़ निष्ठां के कारण जहाँ एक ओर उन्होंने अपने पदों में बरसाने का वर्णन किया है ~
                     बरसानों हमारी रजधानी रे। 
                     महाराज वृषभानु नृपति जहाँ  कीरतिदा सुभ रानी रे।
                     गोपी-गोप ओप सौं राजैं बोलत माधुरी बानी रे। 
                     रसिक मुकटमणि कुँवरि राधिका वेद पुरान बखानी रे।
                     खोरि साँकरी मोहन ढुक्यो दान केलि रति ठानी रे। 
                     गइवर गिरिवन बीथिन विहरत गढ़ विलास सुख दानी रे।
वहीँ दूसरी ओर हरिवंश जी की वाणी का यशोगान किया है। उनके मत में हितवाणी सर्वगुण सम्पन्न ,अगाध ,अमल और रतिसाध से ओतप्रोत है। उसकी गम्भीरता को केवल रस-मर्मज्ञ ही अनुभव कर सकते हैं। इस वाणी रुपी गुन (डोर )में हितहरिवंश ने रसिक-भक्तों के धारण करने के लिए राधा-कृष्ण नित्य नूतन छवि को पिरोया है :
                     व्यास सुवन  वानी अमल अति गुन अमित अगाध। 
                     मोद    विनोद   लड़ावने   लोभ   ललक   रति-साथ।।
                     अति  अगाध  आनन्द  अमल  प्रेम ललक रस मूल। 
                     हास    विलास   हुलास   में  वानी   में   अति   फूल।।
                     नव नव छवि अति विमल नग गुन वानी मृदु मोहि। 
                     रूप  भेद  रचि  रसिक  मनि  सुजन धरैं  मन मोहि।।
           प्रेम में मग्न हो नागरीदास ने राधा-कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन अपनी वाणी में किया है। रास के इस वर्णन में कवि ने तत्कालीन हाव-भावों का सुन्दर निरूपण किया है इसके अतिरिक्त नृत्य के अनुरूप भाषा में भी गति और लय लक्षित होता है:
                    उधरि मुख मुसकि मृदु ललित करताल दे ,
                                      सुरत  तांडव   अलग   लाग   लीनी।
                    विविध विध रमित रति देत सुख प्रानपति। 
                                      छाम कटि  किंकिनी  कुनित कीनी।।
                    उरप तिरपनि लेट सरस् आलाप गति,
                                      मुदित   मद  देन  मधु  अधर दीनी।
                    अमित उपजनि सहित सार सुख संचि रति ,
                                      भाम  हिय  लखत   रमि  रंग भीनी।।
                    स्वाद चौपनि चढ़ी लाड़ लाड़िली लड़ी ,
                                      अवनि दुति तन तड़ित घन सुछीनी। 
                    कोक-संगीत गुन मथन की माधुरी ,
                                      नागरीदासि   अलि   दृगनि   भीनी।।

साभार स्रोत :ग्रन्थ अनुक्रमणिका 

  • श्री हितहरिवंश गोस्वामी सम्प्रदाय और सिद्धान्त :ललिता चरण गोस्वामी 
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 


शनिवार, 20 मई 2017

ध्रुवदास

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                 अशर्फी लाल मिश्र 

जीवन परिचय :
           राधावल्लभ सम्प्रदाय में ध्रुवदास का भक्त कवियों में प्रमुख स्थान है। इस सम्प्रदाय भक्ति-सिद्धान्तों का जैसा सर्वांगपूर्ण विवेचन इनकी वाणी में  उपलब्ध होता है वैसा किसी अन्य भक्तों की वाणी में नहीं। सम्प्रदाय में विशेष महत्वपूर्ण स्थान होते हुए भी आप के जन्म-संवत आदि का कुछ भी निश्चित पता नहीं है। आपने अपने  रसानन्द लीला  नामक ग्रन्थ में उसका रचना-काल इस प्रकार दिया है :
                      संवत सोलह सै पंचासा ,बरनत हित ध्रुव जुगल बिलासा। 
 इस ग्रन्थ को यदि आप  की  प्रारम्भिक रचना  माना   जाय तो उससे कम से कम बीस वर्ष पूर्व की जन्म तिथि माननी होगी । इस आधार पर आप का जन्म संवत १६३० के आसपास सुनिश्चित होता है। इसीप्रकार ध्रुवदास जी के रहस्यमंजरी लीला नामक ग्रन्थ में उपलब्ध निम्न दोहे के आधार पर इनके मृत्यु संवत १७०० के आसपास का अनुमान लगाया जा  सकता है :
                      सत्रह सै द्वै ऊन अरु अगहन पछि उजियार। 
                      दोहा   चौपाई  कहें  ध्रुव  इकसत  ऊपर चार।।
ध्रुवदास जी का जन्म देवबन्द ग्राम के कायस्थ कुल में हुआ था।आप के वंश में पहले से ही वैष्णव-पद्धति की अनन्य उपासना चलती थी। ध्रुवदास जी के वंशजों के अनुसार इनके पितामह श्री हितहरिवंश जी के शिष्य थे। इनके पिता श्यामदास भी परमभक्त और समाज सेवी पुरुष थे। ध्रुवदास की रचनाओं से पता चलता है कि पिता  समान इन्होंने भी श्री गोपीनाथ जी से ही युगल-मन्त्र की दीक्षा ली :
                      श्री गोपीनाथ पद उर धरैं  महागोप्य रस धार। 
                       बिनु विलम आवे  हिये अद्भुत  जुगल विहार।।
             ध्रुवदास जी जन्मजात संस्कारों के कारण शैशव में ही विरक्त हो गए और अल्पायु में ही वृन्दावन चले आये। ये स्वभाव से अत्यंत विनम्र ,विनीत,साधुसेवी,सहनशील और गंभीर प्रकृति के महात्मा थे।
रचनाएँ :
आप की सभी रचनाएँ मुक्तक हैं। अपने ग्रंथों का नाम लीला  रखा। इनके ग्रंथों या लीलाओं की संख्या बयालीस है। इसके अतिरिक्त आप के १०३ फुटकर पद और मिलते हैं ।जिन्हें पदयावली के नाम से बयालीस लीला में स्थान दिया गया है।

भक्ति माधुर्य :
वृन्दावन घन-कुञ्ज में प्रेम -विलास करने वाले अपने उपास्य-युगल श्यामा-श्याम का परिचय ध्रुवदास जी ने निम्न कवित्त में दिया है :
                          प्रीतम किशोरी गोरी रसिक रंगीली जोरी ,
                                   प्रेम के रंग ही बोरी शोभा कहि जाति  है। 
                          एक प्राण एक बेस एक ही सुभाव चाव ,
                                    एक बात दुहुनि के मन को सुहाति है।
                         एक कुंज एक सेज एक पट  ओढ़े बैठे ,
                                    एक एक बीरी दोउ खंडि खंडि खात हैं। 
                          एक रस एक प्राण एक दृष्टि हित ध्रुव 
                                    हेरि हेरि बढ़े चौंप क्यों हू न अघात हैं।।(बयालीस लीला :द्वितीय श्रंखला ;पृष्ठ १०३ )
           राधा-कृष्ण के पारस्परिक प्रेम का वर्णन निम्न  कवित्त में दृष्टव्य है  :
                         जैसी अलबेली बाल तैसे अलबेले लाल ,
                                  दुहुँनि में उलझी सहज शोभा नेह की। 
                          चाहनि के अम्बु दे- दे सींचत हैं छिन -छिन ,
                                   आलबाल भई -सेज छाया कुञ्ज गेह की।
                          अनुदिन हरी होति पानिष वदन जोति ,
                                   ज्यों ज्यों ही बौछार ध्रुव लागे रूप मेह की। 
                          नैननि की वारि किये हरैं सखी मन दियें ,
                                   चित्र सी ह्वै रही सब भूली सुधि देह की।।(बयालीस लीला :प्रथम श्रंखला}
            ध्रुवदास जी ने अपनी आराध्या राधा के स्वाभाव तथा सौन्दर्य का वर्णन कई कवित्त और सवैयों में किआ है। निम्न  कवित्त उनकी काव्य-प्रतिभा एवं कल्पना शक्ति का पूर्ण परिचायक है।
                          हँसनि में फूलन की चाहन में अमृत की ,
                                    नख सिख रूप ही की बरषा सी होति है। 
                           केशनि की चन्द्रिका सुहाग अनुराग घटा ,
                                     दामिनी की लसनि दशनि ही की दोति है।
                          हित ध्रुव पानिप तरंग रस छलकत ,
                                     ताको मानो सहज सिंगार सीवाँ पोति है। 
                          अति अलबेलि प्रिये भूषित भूषन बिनु ,
                                    छिन छिन औरे और बदन की जोति है।(बयालीस लीला :भजन श्रृंगार सत लीला )
           राधा-कृष्ण की संयोग परक लीलाओं में होरी,झूलन, मंगला ,द्युत-क्रीड़ा ,जल-विहार,रास आदि सभी लीलाओं का वर्णन ध्रुवदास ने किया है। होरी के निम्न वर्णन को पढ़कर होली खेलते हुए नर-नारियों का वास्तविक चित्र पाठक के सम्मुख आ जाता है।
                         लाल   लड़ैती   जू  खेलहीं   आज  होरी  का त्यौहार हो। 
                         फूली   संग   सखी    सबै   निरखत   प्रेम   विहार   हो।। 
                         प्यारी  पहिरैं   सारी  केशरी  दिए  बेंदी लाल गुलाल हो। 
                         मोहे   मोहन   मोहनी    चितवनि    नैन   विशाल   हो।। 
                         अद्भुत   उड़न   गुलाल  की  पिचकारी   धार  निहारि हो।
                         मानों     घन  अनुराग   के   वरषत   आनंद   वारि   हो।। 
                         लटकनि ललित सुहावनी पद मटकनि करनि सुदेश हो। 
                         झटकनि उर हारावली  ध्रुव कहि न सकत छवि लेश हो।।  (पद्यावली ;पृष्ठ २० )

           राधा-कृष्ण का यह विहार केवल प्रेम का विहार है। प्रेम के प्रकाशनार्थ प्रेम-स्वरुप राधा-कृष्ण परस्पर क्रीड़ा करते हैं। प्रेम-सर्वस्वा सखियाँ ही इन प्रेम-लीलाओं का आस्वादन करती हैं। तथा इन लीलाओं की स्थली वृन्दावन-धाम भी प्रेममय है। तात्पर्य यह है कि  नित्य विहार में साधन एवं  साध्य सभी कुछ प्रेम है।
                        प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रचि ,
                                 प्यार ही सों प्यारे लाल प्यारी बात करहीं। 
                       प्यार ही की चितवनि मुसिकनि प्यार ही की ,
                                 प्यार ही सों प्यारी जू को प्यारो अंक भरहीं।।
                        प्यार सों लटकि रहे ,प्यार ही सों मुख चहै। 
                                 प्यार ही सों प्यारो प्रिया अंक भुज धरहीं। 
                        हित ध्रुव प्यार भरी प्यारी सखी देखैं खरी ,
                                 प्यारे प्यार रह्यो छाइ प्यार रस ढ़रहीं।।
         ध्रुवदास अपने मन को शिक्षा देते हुए कहते हैं ~
                         रे मन अरु सब छाँड़ि के ,जो अटके इकठौर। 
                         वृन्दावन घन कुंज में ,जहाँ रसिक सिरमौर।।
           सखी भाव से उपास्य-युगल की सेवा करना और सेवा करते हुए उनके विहार का दर्शन कर कृतार्थ होना ही ध्रुवदास की दृष्टि में उपासक  का धर्म है।

साभार स्रोत :ग्रन्थानुक्रमणिका 

  • बयालीस लीला और पद्यावली :श्री ध्रुवदास 
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:  :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 




गुरुवार, 18 मई 2017

हरिराम व्यास

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                  अशर्फी लाल मिश्र 

जीवन परिचय :
हरिराम व्यास की राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में गणना की जाती है। ओरछानरेश महाराज मधुकरशाह के राजगुरु हरिराम व्यास ब्रजमंडल के प्रसिद्ध रसिक भक्तों में से हैं। इनका जन्म-स्थान  ओरछा (टीकमगढ़ ) राज्य माना  जाता है। व्यास जी के जन्म- संवत  में   कोई ऐतिहासिक या अन्य ऐसा उल्लेख नहीं   मिलता जिसके आधार पर   निर्विवाद  रूप से कुछ कहा जा सके । परन्तु इनकी रचनाओं और अन्य भक्त कवियों की वाणी से जो संकेत उपलब्ध होते हैं  आधार पर व्यास जी का जन्म -संवत १५४९ और मृत्यु-संवत १६५० से  १६५५ के मध्य स्वीकार किया जा सकता है।
        व्यास जी जन्म सनाढ्य ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम समोखन शुक्ल था ,इसी नाम को कतिपय स्थलों सुमोखन या सुखोमणि भी लिखा गया है। व्यास जी ने अपने परिवार की परम्परा के अनुकूल शैशव में ही संस्कृत का अच्छा ज्ञान प्राप्त किया था। वे बड़े विद्या-व्यसनी पंडित थे। पुराण और दर्शन से विशेष अनुराग था। 
       व्यास जी सच्चे आस्तिक भाव के गृहस्थ थे ,युवावस्था में उनका विवाह हुआ था। उनकी पत्नी का नाम गोपी कहा जाता है। निम्न  दोहे से प्रतीत होता है कि इनके दीक्षा- गुरु हितहरिवंश थे :
                             उपदेस्यो रसिकन प्रथम ,तब पाये हरिवंश। 
                             जब हरिवंश कृपा करी ,मिठे व्यास के संश।।
भक्तों और साधु -सन्तों की सेवा को ही व्यास जी जीवन की सार्थकता मानते थे। 
रचनाएँ :
  • व्यास-वाणी (हिन्दी में )-प्रकाशित 
  • रागमाला (हिन्दी में )
  • नवरत्न ((संस्कृत में)
  • स्वधर्म पद्धति (संस्कृत  में)

माधुर्य भक्ति 
     
               व्यास जी के उपास्य श्यामा-श्याम रूप, गुण तथा स्वाभाव सभी दृष्टियों से उत्तम हैं। ये वृन्दावन में विविध  प्रकार रास आदि की लीलाएं करते हैं। इन्हीं लीलाओं का दर्शन करके रसिक भक्त आत्म-विस्मृति की आनन्दपूर्ण दशा को सहज ही प्राप्त कर लेते हैं। यद्यपि रधावल्लभ सम्प्रदाय में राधा और कृष्ण को परस्पर किसी प्रकार के स्वकीया या परकीया भाव के बन्धन में नहीं  बाँधा  गया ,किन्तु लीलाओं का वर्णन करते समय कवि ने सूरदास की भाँति यमुना-पुलिन पर अपने उपास्य-युगल का विवाह करवा दिया है।

                         मोहन मोहिनी को दूलहु। 
                        मोहन की दुलहिनी मोहनी सखी निरखि निरखि किन फूलहु। 
                        सहज   ब्याह   उछाह ,सहज  मण्डप ,सहज यमुना के कूलहू। 
                        सहज  खवासिनि   गावति   नाचति   सहज  सगे  समतूलहु।। (व्यास वाणी ;पृष्ठ ३६२ )
                यही कृष्ण और राधा व्यास जी सर्वस्व हैं। इनके आश्रय में ही जीव को सुख की प्राप्ति हो सकती है,अन्यत्र तो केवल दुख ही दुख है। इसीकारण अपने उपास्य के चरणों में दृढ़ विश्वास रखकर सुख से जीवन व्यतीत करते हैं:
                       काहू   के  बल  भजन कौ ,काहू के आचार। 
                       व्यास भरोसे कुँवरि के ,सोवत पाँव पसार।।(व्यास वाणी :पृष्ठ १ ८ २ )
              राधा के रूप सौन्दर्य का वर्णन दृष्टव्य है :
                       नैन खग उड़िबे को अकुलात। 
                       उरजन  डर  बिछुरे  दुख  मानत ,पल पिंजरा  न समात।। 
                       घूंघट  विपट  छाँह  बिनु  विहरत ,रविकर कुलहिं ड़रात। 
                       रूप अनूप   चुनौ  चुनि  निकट  अधर  सर देखि सिरात।।
                       धीर  न धरत ,पीर कहि सकत न ,काम बधिक की घात। 
                       व्यास स्वामिनी सुनि करुना  हँसि ,पिय के उर लपटात।।( व्यास वाणी :पृष्ठ २४२ )
               साधना की  दृष्टि व्यास जी  भक्ति  का विशेष महत्व स्वीकार किया है है। उनके विचार से व्यक्ति का जीवन केवल भक्ति से सफल हो सकता है :
                       जो त्रिय होइ न हरि की दासी। 
                       कीजै कहा रूप गुण सुन्दर,नाहिंन श्याम उपासी।।
                       तौ दासी गणिका सम जानो दुष्ट राँड़ मसवासी। 
                       निसिदिन अपनों अंजन मंजन करत विषय की रासी।।
                       परमारथ स्वप्ने नहिं जानत अन्ध बंधी जम फाँसी। ----(व्यास वाणी ;पृष्ठ ८४ )
                व्यास जी के अनुसार प्रत्येक रसिक भक्त को अनन्य भाव से राधा-कृष्ण की भक्ति करनी चाहिए। राधा-कृष्ण की इस प्रेमाभक्ति से सभी कुछ सिद्ध हो जाता है:
                      नैन न मूंदे ध्यान कौ ,किये न अंगनि न्यास। 
                      नांचि गाय  रसहिं मिले ,वसि वृन्दावन वास।।(व्यास वाणी :पृष्ठ १ ८१ )

             इस प्रकार की भक्ति में केवल वृन्दावन वास की ही शर्त है। वृन्दावन का महत्व श्यामा-श्याम की विहार स्थली के कारन है। यहाँ  रहते हुए जीव को  उपास्य-युगल की नित्य होने वाली विविध प्रेम-लीलाओं  का साक्षात अनुभव होता है।अतः इससे अधिक सुविधाजनक एवं रमणीय वास का  स्थान  और कोई भी  नहीं हो सकता। वृन्दावन का महत्व स्वीकार करने के साथ-साथ व्यास जी ने वृन्दावन की शोभा का भी सरस शव्दावली में वर्णन किया है।   वसंत  कालीन वृन्दावन का वर्णन :
                      चल चलहिं वृन्दावन वसन्त आयो। 
                      झूलत   झूलन   के झँवरा   मारुत     मकरन्द   उड़ायो ।।
                      मधुकर कोकिल कीर कोक  मिलि   कोलाहल  उपजायो। 
                      नाचत   स्याम   बजावत   गावत   राधा  राग   जमायो।।
                      चौबा   चंदन     बूका   बन्द्न    लाल   गुलाल    उड़ायो।
                      स्याम स्यामिनी की छवि निरखत रोम-रोम सचु पायो।।(व्यास वाणी :पृष्ठ ४१५ )                              पावस ऋतु का वर्णन ~~
                      आजु कछु कुंजन में वर्षा सी। 
                      बादल दल में देखि सखी री चमकति है चपला सी। 
                      नान्हीं नान्हीं बूंदनि कछु धुरवा से बहै सुखरासी।
                      मंद मंद गरजनि सी सुनियत नाचती मोर सभा सी। 
                      इंद्रधनुष बग पंगत डोलति ,बोलति कोक-कला सी।
                      इन्द्र वधू छवि छाइ रही ,मनु गिरि पर अरुन घटा सी।
                      उमगि मही रूह सेमहि फूली भूली मृग माला सी।
                      रटत व्यास चातक ज्यों रसना रस पीवत हूँ प्यासी।।(व्यास वाणी :पृष्ठ ३९२ )

           नृत्य  के निम्न वर्णन में व्यास जी जहाँ एक ओर राधा और कृष्ण की अंग-चेष्टाओं का सुन्दर ढंग से निरूपण किया है,वहाँ विषयानुकूल शब्द योजना द्वारा नृत्य के अनुरूप  गीत  में भी गति,ताल और लय लाने की चेष्टा की है :
                   श्याम नटुवा नटत राधिका संगे। 
                   पुलिन अद्भुत रच्यो ,रूप गुन सुख सच्यौ ,निरखि मनमथबधू मान-भंगे।।
                   तत्त थेई थेई मान ,सप्तसुर षट गान,राग रागिनी तान श्रवन भंगे। 
                  लटकि -मुह -पटकि ,पद मटकि ,पटु झटकि ,हँसि विविध कल माधुरी अंग अंगे।।
                  रतन कंकन क्वनित किंकिन नूपुरा-चर्चरी  ताल मिलि मनि मृदंग।
                  लेति नागर उरप ,कुँवरि औचर  तिरप ,व्यासदासि सुघरवर सुधंगे।। (व्यास वाणी :[पृष्ठ ३४४ )
          रसिक भक्त लोक-लाज ,वेद-विधि आदि सभी से ऊपर उठकर सदा राधा-कृष्ण की इन्हीं लीलाओं में मस्त रहता है। उसे किसी के उपहास की चिन्ता नहीं और न ही किसी की प्रशंसा की अपेक्षा है। यही उपासक की अनन्यता है। उसका आदर्श लोक,लाज ,कुल कानि आदि सभी परित्याग करके कृष्ण-प्रेम में अनुरक्त गोपी हैल
                  जो भावै सो लोगन कहन  दे। 
                   अवनि पिछौडी पाँव न दीजै , न्याव  मेटि प्रीति निबहन दै ।। 
                   हौं जोवन मदमाती सखी री ,मेरी छतियाँ पर मोहन रहन दै । 
                   नव निकुंज पिय अंग संग मिलि सुरति पुंज रससिन्धु थहन दै। 
                   या सुखकारन  व्यास आस के लोक वेद उपहास सहन दै।(व्यास वाणी :पृष्ठ ५१७ )
उपासक-धर्म के  में व्यास जी ने सखी- भाव से राधा-कृष्ण की सेवा का उल्लेख अपनी वाणी में  किया है। उनके अनेक पदों में व्यास-दासि का उल्लेख मिल जाता है। किन्तु निम्न पद में तो उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी स्वामिनी प्रिया के चरणों में सहचरी भाव प्राप्ति की अभिलाषा प्रकट की है~~
                    बलि  जाऊँ राधा मोहिं रहन दै वृन्दावन के सरन। 
                    मोको  ठौर  न  और  कहूँ  जब  सेऊँगो  ये   चरन।।
                    सहचरि  ह्वै  तेरी  सेवा  करिहूँ ,पहिराऊँ आभरन। 
                    अति उदार अंग अंग माधुरी ,रोम रोम सुख करन।।
                    देखौं    केलि वेलि  मन्दिर  में किंकिनी रव-श्रवन। 
                    दीजै वेगि व्यास को यह सुख जहाँ न जीवन मरन।।(व्यास वाणी ;पृष्ठ १७७-७८ )

साभार स्रोत : ग्रन्थ अनुक्रमणिका 

  • व्यास  वाणी 
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 


मंगलवार, 16 मई 2017

राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक : गोस्वामी हितहरिवंश

By : अशर्फी लाल मिश्र
अशर्फी लाल मिश्र 
                                                     

जीवन परिचय :
राधावल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक एवं कवि गोस्वामी हितहरिवंश का जन्म मथुरा मण्डल के अन्तर्गत  बाद ग्राम में हुआ। इनका जन्म वि ० सं ० १५५९ में वैशाख मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को प्रातः काल हुआ। इनके पिता नाम व्यास मिश्र और माता  का नाम तारारानी था। जन्म के अवसर पर इनके पिता बादशाह के साथ दिल्ली से आगरा जा रहे थे। मार्ग में ही बाद  ग्राम में हितहरिवंश जी का जन्म हुआ। इनके जन्म के बाद  व्यास मिश्र देवबन में रहने लगे।
          व्यास मिश्र स्वयं विद्वान थे अतः उन्होंने बालक हरिवंश की उचित शिक्षा का प्रवन्ध आठ वर्ष की आयु में कर दिया। यथा अवसर पर इनका विवाह रुक्मिणी देवी से हुआ। रुक्मिणी देवी से इनके तीन पुत्र ~~

  • वनचन्द्र 
  • कृष्णचन्द्र 
  • गोपीचंद्र 
तथा एक पुत्री साहिब देवी हुई। 
       हरवंश जी के जीवन के प्रथम बत्तीस वर्ष देवबन में व्यतीत हुए। माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् समस्त गृह-सम्पत्ति ,पुत्र ,स्त्री आदि का त्यागकर ये वृन्दावन की ओर चल पड़े। मार्ग में चिड़थावल ग्राम से इन्होंने राधावल्लभ की मूर्ति लेकर एवं ब्राह्मण की दो कन्याओं  को श्री जी की आज्ञा से स्वीकार कर  वृन्दावन आ गये। वृन्दावन में इन्होंने राधावल्लभ लाल  की  स्थापना की और उन्ही के भजन  एवं सेवा-पूजा में अपना शेष जीवन व्यतीत कर दिया। पचास वर्ष की आयु में वि ० सं ० १६०९ में शरद पूर्णिमा की रात्रि को इस नश्वर संसार को त्याग दिया। 
रचनाएँ :
  • राधासुधानिधि :संस्कृत भाषा में राधाप्रशस्ति 
  • स्फुट पदावली ;ब्रजभाषा में 
  • हित  चौरासी :ब्रजभाषा में 
स्फुट पदावली में सिद्धान्त के कुछ दोहों के अतिरिक्त राधा- कृष्ण की ब्रज-लीला का वर्ण है। और हित  चौरासी में मधुर -लीला -परक  चौरासी स्फुट पदों का संग्रह है। हित चौरासी राधावल्लभ सम्प्रदाय का मेरुदण्ड है जिसमें राधा -कृष्ण का अनन्य प्रेम,नित्य विहार ,रासलीला ,भक्ति-भावना ,प्रेम में मान आदि की स्थिति ,राधावल्लभ का यथार्थ स्वरुप आदि वर्णन किया गया है। 
माधुर्य भक्ति :
गोस्वामी हितहरिवंश की आराध्या श्री राधा हैं किन्तु राधा-वल्लभ होने के श्रीकृष्ण का भी बहुत महत्व है। अपने  सिद्धांत  के छार दोहों में इन्होंने कृष्ण के ध्यान तथा नाम-जप का भी निर्देश दिया है। ~~
श्रीराधा-वल्लभ नाम को ,ह्रदय ध्यान मुख नाम। इस प्रकार सिद्धांततः आनन्द-स्वरूपा  राधा ही आराध्या हैं। किन्तु उपासना में राधा और उनके वल्लभ श्रीकृष्ण दोनों ही ध्येय हैं ।
           गोस्वामी हितहरिवंश के अनुसार आनन्दनिधि श्यामा ने श्रीकृष्ण के लिए ही बृषभानु गोप के यहां जन्म लिया है। वे श्रीकृष्ण के प्रेम में पूर्ण रूपेण रंगी हुई हैं। प्रेममयी होने के साथ-साथ श्रीराधा रूपवती भी हैं। इनकी सुन्दरता  का वर्णन दृष्टव्य :
               आवत श्री बृषभानु दुलारी। 
               रूप   राशि   अति    चतुर  शिरोमणि  अंग-अंग   सुकुमारी।।
               प्रथम  उबटि ,मज्जन  करि , सज्जित नील बरन तन सारी। 
               गुंथित   अलक , तिलक   कृत  सुन्दर ,सुन्दर  मांग सँवारी।।
               मृगज   समान   नैन  अंजन  जुत , रुचिर   रेख    अनुसारी। 
               जटित   लवंग    ललित  नाशा  पर  ,दसनावली    कृतकारी।।
               श्रीफल  उरज  कुसंभी  कंचुकी  कसि  ऊपर हार छवि न्यारी। 
               कृश   कटि ,उदर  गंभीर  नाभि पुट ,जघन नितम्बनि भारी।।
               मानों   मृनाल   भूषन  भूषित   भुज  श्याम  अंश   पर  डारी।।
               जै श्री हितहरिवंश जुगल करनी गज विहरत वन पिय प्यारी।।(हितचौरासी :पद ४५ )
         राधावल्लभ भी सौन्दर्य की सीमा हैं। उनके वदनारविन्द की शोभा कहते नहीं बनती। उनका यह रूप-माधुर्य सहज है ,उसमें किसी प्रकार की कृत्रिमता नहीं। उनके इस रूप का पान कर सभी सखियाँ अपने नयनों को तृप्त करती हैं।
                    लाल की रूप माधुरी  नैननि  निरखि नेकु सखि। 
                    मनसिज मन हरन  हास ,सामरौ  सुकुमार राशि,
                    नख सिख अंग अंगनि उमंगी ,सौभग सीँव नखी।।
                    रंगमगी   सिर सुरंग  पाग , लटक रही वाम भाग ,
                    चंपकली   कुटिल      अलक   बीच     बीच   रखी। 
                    आयत   दृग   अरुण   लोल ,कुंडल मंडित कपोल ,
                    अधर दसन दीपति की छवि क्योंहू न जात लखी।।
                    अभयद    भुज  दंड   मूल   ,पीन  अंश  सानुकूल ,
                    कनक    निकष    लसि   दुकूल ,दामिनी  धरखी।
                    उर   पर   मंदार   हार ,मुक्ता   लर     वर   सुढार, 
                    मत्त   दुरद   गति ,तियन   की देह   दशा करखी।।(स्फुट वाणी :पद २२ )
          श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी तथा वेणु-माधुरी से हरित-मना गोपी अपनी सखी से श्रीकृष्ण-मिलन  की अभिलाषा जिस प्रकार प्रकट करती है उसका स्वाभाविक रूप हमें हितहरिवंश केके निम्न पद में मिलता है :
                    नन्द के लाल हरयो मन मोर। 
                    हौं   अपने   मोतिन   लर   पोवति  कांकर  डारि  गयो सखि मोर।।
                   अंक   बिलोकनि   चाल   छबीली  रसिक   शिरोमणि  नंदकिशोर। 
                   कहि   कैसे   मन   रहत   श्रवन  सुनि  सरस मधुर मुरली को घोर।।
                   इंदु   गोविन्द   वदन  के  कारन  चितवन  को   भये  नैन    चकोर। 
                   जै श्री हितहरिवंश रसिक रस जुवती तू ले मिलि सखी प्राण अकोर।।(हितचौरासी ;पद १३ )
           इस प्रकार की प्रेम दशा केवल राधा की नहीं है अपितु श्रीकृष्ण भी राधा के प्रेम में व्याकुल रहते हैं। उनकी इस आकुलता का वर्णन कवि ने निम्न पद में सुन्दर  अलंकारिक भाषा में किया है~~
                   कहा कहौं इन नैननि की बात। 
                  ये अलि प्रिया बदन  अम्बुज  रस  अटके अनत न जात।।
                  जब जब रुकत पलक सम्पुट लट अति आतुर अकुलात। 
                  लंपट  लव   निमेष  अन्तर  ते  अलप-कलप  सत सात।।
                 श्रुति पर  कंज दृगंजन ,कुछ बिच मृगमद ह्वै न समात। 
                जै श्री हितहरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।।(हितचौरासी :पद ६० )
       कवि द्वारा रास- लीला का सुन्दर वर्णन निम्न पद में ~~
                आजु  गोपाल  रास  रस  खेलत  पुलिन  कल्पतरु  तीर री सजनी। 
                शरद  विमल नभचन्द्र  बिराजत  रोचक  त्रिविध समीर री सजनी।।
                चंपक बकुल  मालती  मुकुलित  मत्त मुदित पिक कीर री सजनी। 
               देशी   सुगंध  राग  रंग   नीको  ब्रज  जुबतिन  की  भीर  री  सजनी।।
               मधवा  मुदित   निसान बजायो  व्रत  छाड़्यो  मुनि  धीर री सजनी। 
              जै श्री हितहरिवंश मगन  मन श्यामा हरत मदन घन पीर री सजनी।। (हितचौरासी :पद २४  )

साभार स्रोत:ग्रन्थ अनुक्रमणिका 

  • हितचौरासी 
  • स्फुट पदावली
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 

रविवार, 14 मई 2017

वल्लभ रसिक

By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
श्री वल्लभ  रसिक गौड़ीय सम्प्रदाय के ऐसे दूसरे कवि हैं जिनका साहित्य के किसी ग्रन्थ में उल्लेख नहीं मिलता। गदाधर भट्ट जी के वंशजों के अनुसार वल्लभ रसिक भट्ट जी के द्वितीय पुत्र थे। इनके बड़े भाई का नाम रसिकोत्तंस था। भट्ट जी अपने दोनों पुत्रों को स्वयं शिक्षा और दीक्षा दी। इस आधार पर वल्लभ रसिक का कविताकाल वि ० सं ० १६५० के आस पास स्वीकार किया जा सकता है। क्योंकि गदाधर भट्ट का समय वि ० सं ० १६००  से कुछ पूर्व का अनुमानित किया गया है । भट्ट जी के पुत्र होने के  कारण  ये भी दक्षिणात्य  ब्राह्मण हैं। किन्तु इन सभी तथ्यों ~~ समय,वंश सम्प्रदाय आदि के विषय में वल्लभ रसिक ने स्वयं कुछ नहीं लिखा। अपनी वाणी में तो महाप्रभु चैतन्य अथवा षट्गोस्वामियों की उन्होंने वन्दना भी नहीं की।
रचनाएँ :

  • वल्लभ रसिक की वाणी  (प्रकाशक बाबा कृष्णदास ;कल्याण प्रिंटिंग प्रेस ,आगरा )
वल्ल्भ रसिक ने अपने भावों की  अभिव्यक्ति  पद,सवैया ,कवित्त ,दोहा,चौपाई आदि छंदों में की है। ये सभी छान स्फुट रूप में हैं। इन छंदों का मुख्य विषय राधा-कृष्ण का विहार-वर्णन है। इसके अतिरिक्त कुछ पद ,सवैया आदि पवित्रा ,वर्षगांठ ,दशहरा ,दीपावली आदि पर भी हैं। 

माधुर्य भक्ति :
वल्लभ रसिक के विचार में संसार के सभी नाते झूठे हैं। अतः इन सम्बन्धों तो तोड़कर हमें राधा-कृष्ण युगलवर से ही अपना सम्बन्ध छोड़ना चाहिए। ये उपास्य-युगल रस के सागर हैं इसलिए इनसे नाता हो जाने पर भक्त भी सदा रस-सिंधु में मग्न होकर आनन्द प्राप्त करते हैं। उनकी रूप माधुरी अपूर्व है जिसे देखकर उपासक के नेत्र कभी तृप्त नहीं होते। इसीलिए उन्होंने कहा है ~~ 
                        हम तो युगल रूप रस माते नाते के माने। 
                        देही नाते नेक न माने ह्यांते हैं अलसाने।।
                        श्याम सनेही हिये सुहाते नाते तिन सों ठाने।          
                        वल्ल्भ  रसिक फिरें इतराते चितराते उमदाने।।(वल्लभ रसिक की वाणी :पृष्ठ३९ )     
             वल्लभ रसिक ने प्रेम क्षेत्र में राधा को भी उच्च स्थान दिया है। 
                        यद्यपि दोउन की लगन सब मिलि कहें समान। 
                         पै    प्यारी    महबूब  है आशिक      प्यारो  जान।।(वल्लभ रसिक की वाणी :पृष्ठ ७३ )
            राधा-कृष्ण की विविध मधुर-लीलाओं का ध्यान करना ही वल्लभ रसिक की उपासना है राधा-कृष्ण का यह प्रेम जनित है। अतः इसमें आदि अन्त नहीं है। वह  निजी सुख कामना से रहित है। इसीलिए उसे उज्जवल कहा  गया है:
                        अहर   पहर   रस   खेलत    बीतें। 
                        खेलनि   में    हारनि    को  जीतें।।
                        रसिकन    चश्मो      का    चश्मा। 
                        उज्जवल रस का जिन पर बसमा।।(वल्लभ रसिक की वाणी :पृष्ठ ७५  )
            वल्लभ रसिक ने राधा-कृष्ण की संयोग और वियोग सूचक दोनों प्रकार की लीलाओं का वर्णन अपनी वाणी में किया है। इनमें वियोग की अपेक्षा संयोग परक लीला के पदों,सवैयों की संख्या अधिक है। संयोग की लीलायें सभी प्रकार की हैं ~~ झूलन, रास,होरी, द्युत-क्रीड़ा, रथयात्रा ,जल-क्रीड़ा ,सूरत,विहार आदि। इन सभी का वर्णन कवि ने बहुत सुंदर दंग से किया है। झूलन के इस वर्णन में भक्त की भावुकता ,अलंकार तथा लाक्षणिक प्रयोग के कारण कवि की कव्य-प्रतिभा लक्षित होती है :
                        आज दोऊ झूलत रति रस साने। 
                        ठाढ़े   मचकें  लचकि  तरुनि  के गहि फल  फूलन आने।।
                        सूहे     पट     पहरें    द्वै    पटुली   बैठे    सामल   गोरी।
                       अलिनु  रंगीली   तिय पद  अंगुली  पिय  डोरी  सों  जोरी।। 
                       श्याम  काम  बस  झूल  झूल पग मूलनि  झूलिनि बढाहीं। 
                       कामिनि चरण तामरस छुटि अलि काम लूटि मचि जाहीं।।
                       जोबन  मधि  जोवन   मद  झूलये   झूलनि  फंदनि जाने। 
                       वल्लभ  रसिक   सखी  के  नैना   एही  झुलानि    झुलाने।।
           राधा की अंग की छवि तथा कृष्ण का उनको देखकर चकित रह जाने का यह वर्णन भी बहुत  मनोहर है। इसमें कवि ने भावों को बहुत अनूठे दंग से अभिव्यक्त किया है~~
                       उरज उतंग अति भरित भरे से अंग ,
                             अधर सुरंग   सों  रंगी सी मति जाति है। 
                      ऊँची गुही वेणी सों तनेनी भौंह भाइ भरी 
                            आइ भरी   छवि  हँसि  लसि इतराति  है।.
                      वल्लभ रसिक दोऊ सनमुख मुख सनें 
                            चकित चकित कित द्यौस कित राति है।
                     नैननि सिहानी ललचानि मुस्क्यानि 
                            तरसानि सरसानि आनि आनि दरसाति है। (वल्लभ रसिक की वाणी :पृष्ठ ५१ )
          सखीभाव गुरु की कृपा से प्राप्त होता है इसकी प्राप्ति पर साधक के लिए राधा-कृष्ण की सेवा ही सब कुछ हो जाती है। वह सदा लोक-लाज छोड़कर उनके विहार में ही लीन  रहता है।
                         आठौ    पहर   रहैं   मतवारे। 
                          लोक वेद  इन  सबै बिसारे।।
                          दोउन  की  खेलनि  में षेलें। 
                          दोउन की झेलनि रस झेलें।।(वल्लभ रसिक की वाणी :पृष्ठ ७६  )
साभार स्रोत ;ग्रन्थ अनुक्रमणिका 







  • वल्लभ रसिक की वाणी :प्रकाशक बाबा कृष्णदास ;कल्याण प्रिंटिंग प्रेस ,आगरा
  •  ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • शनिवार, 13 मई 2017

    माधुरीदास

    By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                   अशर्फी लाल मिश्र 

    परिचय :
    माधुरीदास गौड़ीय सम्प्रदाय के अंतर्गत ब्रजभाषा के अच्छे कवि हैं। अभी तक हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों से इनका कोई परिचय नहीं है। इनकी वाणी के प्रकाशक बाबा कृष्णदास ने इनके विषय में कुछ लिखा है।
    माधुरीदास ने केलि-माधुरी  का रचना काल अपने इस दोहे में दिया है :
                                       सम्वत सोलह सो असी सात अधिक हियधार। 
                                       केलि माधुरी छवि लिखी श्रावण बदि बुधवार।। (माधुरी वाणी :केलि माधुरी :दोहा १२९ )
               ये  रूपगोस्वामी  के शिष्य थे। इस बात की पुष्टि  माधुरीदास की वाणी के निम्न दोहे से होती है:
                                       रूप मंजरी प्रेम सों कहत बचन सुखरास। 
                                      श्री वंशीवट  माधुरी होहु सनातन    दास।। (माधुरी वाणी :वंशीवट  माधुरी :दोहा ३० ८  )
    यहाँ 'रूप मंजरी 'शब्द श्री रूपगोस्वामी के लिए स्वीकर किया गया है। निम्न दोहे से भी ये रूपगोस्वामी के शिष्य होने की पुष्टि होती है ~`
                                      विपिन सिंधु रस माधुरी कृपा करी निज रूप। 
                                      मुक्ता मधुर विलास के निज कर दिए अनूप।। (माधुरी वाणी :केलि माधुरी :दोहा १२६  )
                 बाबा कृष्णदास के अनुसार माधुरीदास ब्रज में माधुरी  कुंड पर रहा  करते थे। यह स्थान मथुरा-गोबर्धन मार्ग पर अड़ींग नामक ग्राम से ढाई कोस ( ८ किलोमीटर ) दक्षिण दिशा में है। अपने इस मत की पुष्टि के लिए कृष्णदास जी ने श्रीनारायण भट्ट के 'ब्रजभक्ति विलास' का उल्लेख किया है।

    रचनाएँ :

    • माधुरी वाणी :
    माधुरी वाणी में सात माधुरियाँ हैं:

    1. उत्कण्ठा 
    2. वंशीवट 
    3. केलि 
    4. वृन्दावन 
    5. दान 
    6. मान 
    7. होरी 
    माधुर्य भक्ति :
                 माधुरीदास ने अपने उपास्य  का परिचय निम्न दोहे में दिया है :
                                          हो निकुंज नागरि कुँवरि ,नवनेही घनश्याम। 
                                         नैंनन में निस दिन रहो ,अहो नैन अभिराम।। (माधुरी वाणी :उत्कंठा माधुरी :दोहा ३४ )
               कृष्ण वर्ण से साँवले परन्तु सुन्दर हैं। उनका मोहन रूप सबको मोहित करने में समर्थ है। इस प्रकार  मनहरण करके भी वे सबको सुखी करने वाले हैं। वे गुणों में रतिनिधि ,रसनिधि ,रूपनिधि और प्रेम तथा उल्लास की निधि हैं। वृन्दाविपिनेश्वरी राधा नवल किशोरी ,गौरवर्णा,भोली,मोहिनी,माधुर्य पूर्ण ,मृगनयनी आमोददा ,आनंद राशि आदि विभिन्न गुणों से संयुक्त हैं। सर्वगुण सम्पन्न  होने के साथ-साथ  रसरूपा हैं।  आधा नाम लेने से भी साधक के सब सुख सिद्ध हो जाते हैं ~` 
                                             गुणनि अगाधा राधिका, श्री राधा रस धाम। 
                                             सब   सुख साधा पाइये , आधा जाको नाम।।
               राधा-कृष्ण के सम्बन्ध में इनके भी वही विचार हैं जो गौड़ीय संप्रदाय के अन्य ब्रजभाषा कवियों के हैं। अतः माधुरीदास ने अपने उपास्य-युगल को दूल्हा-दुल्हिन के रूप में चित्रित किया है ;
                                             माधुरी लता में अति मधुर विलासन की 
                                                          मधुकर आनि लपटानी सब सखियाँ। 
                                             दुलहिन दूलहू के फूल विलास कछु 
                                                          वास ले ले जीवति हैं जैसे मधुमखियाँ।।
               उपास्य-युगल की मधुर -लीलाओं का ध्यान तथा भावना मधुरदास की उपासना है। अतः उन्होंने राधा -कृष्ण की प्रेम -लीलाओं की माधुरी को ही अपनी रचना में गया है.इस विहार का  आधार प्रेम है। इसीलिये राधा -कृष्ण के विलास का ध्यान कर भक्त को अत्यधिक  आनन्द प्राप्त होता है :
                                                परी सुरत जिय आय ,रोम रोम भई सरसता। 
                                                देखहु   सुधा सुभाय ,मोहन को मोहन कियो।।(मा ० वाणी :केलि वाणी :दोहा ८६ )

               इस प्रेम की गति अगम है और इसका स्वरुप कठिन से कठिन है। इस प्रेम  का अनुभव कभी मिलन , वियोग और कभी संयोग-वियोग मिश्रित रूप में होता है। किन्तु इसे वही जान सकता है जिसे इसका कभी अनुभव हुआ हो :
                                        प्रेम अटपटी बात कछु ,कहत बने नहीं बैन। 
                                        कै  जाने मन की दशा , कै    नेही   के   नैन।।(मा० वाणी :वंशीवट :दोहा २४६ )
               राधा-कृष्ण की मधुर  लीलाएं विविध हैं। कभी कृष्ण प्रिया  के साथ हास करने के लिए उसके आभूषणों को उतारते हैं और फिर उन्हें पहना देते हैं ,कभी उनके कपोलों को मृगमद से चित्रित करते हैं और फिर मिटा देते हैं। दूसरी ओर राधा को प्रियतम के इस स्पर्श से अत्यधिक सुख मिलता है। इस अवसर पर राधा में जिन सात्विक भावों का उदय होता है उसका कवि ने बहुत सुंदर वर्णन निम्न कवित्त में किया है ~~
                                      प्यारे के परस होत उपज्यो सरस् रस 
                                                 स्वरभंग वैपथ प्रस्वेद अंग ढरक्यो।
                                      हरष सों फूल्यौ तन तरकी कंचुकी तनि 
                                                 चखन चलत सों सिंगार हार सरक्यो।।
                                      कंकन किंकिणी कटि नीवी हूँ सिथिल भये 
                                                 लोचन कपोल भुज वाम उर फरक्यो। 
                                      चिबुक उठाय के जु  ऊँचे तव कीन्हों मुख
                                                 धीरज न रह  धर धर  हीयो धरक्यो।। ( मा ० वाणी :दान माधुरी ;कवित्त ३१ ) 
               इसके अतिरिक्त राधा-कृष्ण की संयोग-परक लीलाओं में जल- केलि ,नौका-विहार ,रास,दान-लीला,होली आदि का भी सुन्दर वर्णन है। दान-लीला का वर्णन अपनी संवादात्मक शैली के कारण अत्यधिक मनोरम हो गया है। कृष्ण की छेड़छाड़ का उत्तर देती हुई गोपियों की यह उक्ति वाक् चातुर्य का सुन्दर उदाहरण :
                                     घर में न कोऊ जाको वसन उधार देखो ,
                                                    जो पै कछु अब ही ते मन ललचायो है। 
                                    भली कीनी आज ही जगातिन को रूप धरयो , 
                                                   कालि ही तो नंदगाँव बाँह दे बसायो है। 
                                   नाम लेत  वन को न लाज कछु आवति है, 
                                                   वृन्दावन राधाजू को वेदन में गायो है। 
                                   फूल फूल रुखन की जाय रखवारी करो  ,
                                                कोऊ बाग़ बाबा जी ने विसाले लगायो है 
               इसी प्रकार रास के इस वर्णन में बहुत सुन्दर ढंग से तत्कालीन भाव-भंगिमा को उपयुक्त   भाषा में व्यक्त किया गया है:
                                नृत्य लास भ्रू-विलास मन्द मन्द चारु हास ,
                                              रास में विलास केलि  कोटि कोटि कामिनी। 
                               कुंडल मृदु गंड लोल चंचल अचल सुलोल ,
                                              श्रमकन शोभित कपोल कनक धामिनी। 
                                परम् मधुर करत गान लेति सरस सुघर तान ,
                                              निकसत  दुरि जात मन मनहुँ मेघ दामिनी। 
                                टूटत मन कटि प्रदेश छूटत कल कुसुम केस ,
                                              लूटत सुख सिंधु सरस् माया भामिनी।।
               कवि ने  राधा के मान का  वर्णन  मान-माधुरी में किया है। वस्तुतः माधुरीदास की दृष्टि में स्नेह की परिपक्वता के लिए मान की अत्यधिक आवश्यकता है। मान ऊपर से मिश्री के सामान कठोर है किन्तु जब उसका रस ग्रहण किया जाता है तभी उसकी रसवत्ता स्पष्ट होती है :
                               बिन सनेह नहिं मान ,मान विना न सनेह कछु। 
                               जैसे रस मिष्ठान्न ,नोन  सहित रोचक अधिक।।
                               मिश्री मान  समान ,छूवत  कर लागत   कठिन। 
                               जब   कीजै   रस  पान ,तब  जानै   रसना सरस ।। (मान माधुरी :दोहा ३६३ ८ )                                माधुरीदास ने मान का विशद रूप से वर्णन किया है और जहाँ इस वर्णन में रूपात्मक शैली का आश्रय लिया गया है ,वहाँ वर्णन अत्यन्त सरस् हो गयाहै :
                              माली नव मदन तरुनी तन आलवाल ,
                                        जतन जुगति सों जोवन बीज बोयो है। 
                             उपज्यो है अंकुर सनेह को सरस अति ,
                                        सुरति के मेह सों सुलित सरसायो है।
                             मूल प्रतिकूलता सुमन फूल फूलि रह्यो ,
                                        हाव-भाव पल्लव सघन छाँह छायो है। 
                             मधुर ते मधुर लग्यो है एक मान फल ,
                                        सोई जाने सुख जिन लोभी सुख लह्यो है। (मान माधुरी :कवित्त ३५ )
                 राधाकृष्ण की सखी भाव से नित्य-प्रति सेवा करना माधुरीदास का उपासक धर्म है अतः उनकी यही अभिलाषा है ~~
                            एक बार इन लोचननि ,देखों नवल विहार। 
                            इनहीं  हाथन दुहुन को  करौं   बैठि श्रृंगार।।(उत्कण्ठा माधुरी :दोहा ६५ )
              माधुरीदास केवल भक्त ही नहीं वल्कि एक भावुक कवि भी हैं।
              साभार स्रोत :ग्रन्थानुक्रमणिका 

    • माधुरी वाणी :माधुरीदास :प्रकाशक बाबा कृष्णदास 
    • ब्रजभक्ति विलास:श्रीनारायण भट्ट 
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 



    Autobiography of Asharfi Lal Mishra

      Asharfi Lal Mishra(June 1943---) Asharfi Lal Mishra(June 1943---) जीवन परिचय  नाम -अशर्फी लाल मिश्र  पिता का नाम -राम खेलावन  मिश्र [1]  -...