वात्सल्य रस के प्रधान कवि : सूरदास

 By :अशर्फी लाल मिश्र
                                                                         
                                                                सूरदास 


                                                                       
  सूरदास  की प्रशंसा में ठीक ही कहा गया है कि

                        सूर    सूर   तुलसी   शशि ,  उडगन  केशवदास | 
                       अब के सब खद्योत सम ,जँह तँह करत प्रकास || 

इतिवृत्त :सूरदास उन कवियों में से  हैं,जिन पर केवल वल्लभ सम्प्रदाय को नहीँ वरन हिंदी साहित्य को गर्व है। इसी कारण इनके विषय में अधिक से   अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न हुआ है। इनके जीवन-चरित पर प्रकाश  डालने के लिए साहित्य के इतिहासकारों तथा अनुसन्धान कर्ताओं ने अन्तः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों का ही आश्रय लिया है और जहाँ इनसे भी काम नहीं चला वहाँ अनुमान से सहायता ली गई। इसी कारण इनके जन्म संवत आदि के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।
  *आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूरदास का जन्म-संवत १५४० विक्रमी और मृत्यु-संवत १६२० विक्रमी माना है। (हिंदी साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १६१ ) आचार्य शुक्ल की यह मान्यता मुख्य रूप से साहित्य लहिरी पर आधारित है।
*आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि साहित्य लहिरी के रचयिता यही प्रसिद्ध सूरदास थे या कोई अन्य। अतः उन्होंने आचार्य शुक्ल की मान्यता विवाद रहित स्वीकार नहीं किया (हिंदी साहित्य :पृष्ठ १७६-७७).। स्वयं द्विवेदी जी ने सूरदास के जन्म-संवत आदि  के विषय में कोई निश्चित मत नहीं दिया। किन्तु सूरदास के समय की जो रूपरेखा उनके इतिहास में मिलती है ~ वह प्रायः वही है जो आचार्य शुक्ल की है।
*डा ० दीनदयाल गुप्त ने इनका जन्म-संवत १५५५ विक्रमी और मृत्यु-संवत १६ ३ ८  अथवा १६३९ है।
*डा ० मुंशीराम शर्मा का मत इन सभी विद्वानों से भिन्न है। उन्होंने सूर-सौरभ में प्रदत्त अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य के आधार पर यह सिद्ध किया है कि सूरदास संवत १५५५ के  लगभग उत्पन्न हुए और संवत १६२ ८ के आस-पास तक जीवित रहे। (सूर-सौरभ :पृष्ठ ५३ ) .
         'चौरासी वैष्णवन की वार्ता ' के अनुसार सूरदास का जन्म स्थान रुनकता या रेणुका क्षेत्र है। श्री हरिराय जी की वार्ता से पता चलता है कि सूरदास दिल्ली से चारकोस (१२ किलोमीटर ) दूर सीही ग्राम के सारस्वत कुल में पैदा हुए थे। (गो ० हरिराय जी कृत सूरदास की वार्ता ;सम्पादक प्रभुदयाल मीतल :पृष्ठ १-२ ).
*श्री वल्लभाचार्य जी की भेंट के समय मथुरा-वृन्दावन के बीच गऊघाट पर रहा करते थे। सूरदास स्वभाव से विरक्त थे अतः एकान्त में भगवान् के समक्ष अपने भाव व्यक्त किया करते थे। इनके इसी विरक्त-भाव से आकर्षित होकर इनके सेवक बन गए। उस समय के पदों में इन्होंने अपने आपको अशुची ,अकृती ,अपराधी  आदि कहा है। पर वल्लभाचार्य से मिलने के उपरान्त सूर  वास्तव में 'सूर ' हो गए और अपनी भक्ति-निष्ठां तथा अनन्यता के आधार पर एक दिन भगवान् से यह कहने का  साहस भी कर सके ~~
                           बाँह छुड़ाए जात हो निबल जानि के मोहि। 
                           हिरदै  तै  जब  जाहुगे  मरद  बदौंगो तोहि।। 
           कुछ विद्वानों का विचार है कि सूरदास जन्मांध थे,अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। (हिंदी साहित्य ;आचार्य हजारी प्रसाद  द्विवेदी :पृष्ठ :१७३-७४ ) दोनों मतों में से कौनसा  ठीक है , यह निर्णय करना सहज नहीं है। किन्तु तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य वल्लभ से भेंट के समय सूरदास चर्मचक्षुओं की सेवा से रहित थे। इसीलिये आचार्य को इनके अंतर्नयनोंं  को खोल देने में विशेष असुविधा नहीं हुई तत्पश्चात सूरदास ने भगवान् की लीलाओं में ही अपने आप को लीन कर दिया।
            गोकुलनाथ कृत वार्ताओं से पता चलता है कि सूरदास को महाप्रभु ने श्रीनाथ जी की कीर्तन सेवा सौंपी थी। अतः इसी सेवा के निर्वाह-निमित्त इन्होंने लीला-सागर की रचना की। किन्तु श्रीनाथ जी की इस सेवा को इन्हें विवश होकर शीघ्र ही छोड़ना पड़ा। तदुपरान्त ये भगवान् की रास-क्रीड़ा-भूमि परासौली गांव में चले गए और वहीं पर एक दिन अपनी चित्त-वृत्तियों को राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं में नियोजित कर यह गीत गाते  हए~~         
                           बलि  बलि  बलि  हो  कुमर  राधिका नंदसुवन जासों  रति मानी। 
                           वे अति चतुर तुम चतुर शिरोमनि प्रीति करी कैसे होत है छानी।।
                           वे  जु  धरत  तन  कनक  पीत  पट  सो  तो  सब तेरी गति ठानी। 
                           ते  पुनि   श्याम  सहेज  वे   शोभा अंबर मिस अपने उर  आनी।।
                           पुलकित अंग अब ही ह्वै आयो निरखि  देखि निज देह सिरानी। 
                          सुर    सुजान   सखी    के   बूझे   प्रेम   प्रकश   भयो   बिहसानी।।
भगवान् की लीला में लीन हो गए।

काव्य-रचना :

  • सूरसागर 
  • सूर-सारावली (सूरसागर की अनुक्रमणिका )
  • साहित्य-लहरी (कुछ विद्वानों के मतानुसर )
माधुर्य भक्ति :
          सूरदास ने अपने उपास्य राधा-कृष्ण के स्वरुप को निम्न पद के द्वारा स्पष्ट किया है ;
                       ब्रजहिं बसे आपुहि बिसरायो। 
                       प्रकृति  पुरुष   एकै   करि   जानों  बातन   भेद  करायो।।
                       जल थल जहाँ रहो तुम बिन नहिं भेद उपनिषद गायो। 
                       द्वै  तनु जीव  एक हम तुम दोऊ सुख कारन उपजायो।।
                       ब्रह्म  रूप  द्वितीया  नहिं कोई तव मन त्रिया जनायो। 
                       सूर  स्याम मुख देखि अलप हँसि  आनन्द पुंज बढ़ायो।।(सूरसागर ;स ० नन्ददुलारे बाजपेयी;पृष्ठ ८४१)
          स्पष्ट है कि राधा प्रकृति है और कृष्ण पुरुष हैं। अपने इस रूप में अभिन्न हैं। किन्तु लीला-विस्तार के लिए तथा भक्ति के प्रसार के लिए उन्होंने दो शरीर धारण किये हैं :
                       प्रान  इक  द्वै देह कीन्हें,भक्ति-प्रीति-प्रकास। 
                       सूर-स्वाम  स्वामिनी मिलि,करत रंग-विलास।। 
           राधा और कृष्ण का प्रेम सहज है ~ क्योंकि उसका विकास धीरे-धीरे बाल्य-काल से ही हुआ है। दोनों का प्रथम परिचय रवि-तनया के तट पर सहज रूप से होता है। एक दूसरे के सौन्दर्य,वाक्चातुरी तथा क्रीड़ा-कला पर मुग्ध वे परस्पर स्नेह-बंधन में बंध जाते हैं। यही उनके प्रेम का प्रारम्भ है :
                        बूझत स्याम कौन तू गोरी। 
                        कहाँ  रहति  काकी  है   बेटी,  देखी    नहीं   कहूँ   ब्रज    खोरी।।
                        काहे  कौं   हम  ब्रज-तन  आवति,  खेलति  रहति आपनी पोरी। 
                        सुनत रहति स्रवननि नंद-ढोटा,करत फिरत माखन दधि चोरी।।
                        तुम्हरौ   कहा  चोरि   हम   लैहैं,  खेलन  चलौ संग मिलि जोरी। 
                        सूरदास   प्रभु   रसिक-सिरोमनि   बातनि  भुरइ राधिका भोरी।।(सूरसागर: पृष्ठ ४९७ )
          राधा और कृष्ण का सौन्दर्य भी अपूर्व है। निम्न पद में वर्णित राधा और कृष्ण दोनों का सौन्दर्य दर्शनीय है ~~ 
                       खेलन हरि  निकसे ब्रजखोरी। 
                       कटि   कछनी    पीताम्बर   बाँधे,  हाथ    लए   भौंरा,   चकडोरी।।
                       मोर-मुकुट,कुंडल स्रवननि बर,दसन-दमक दामिमि-छवि छोरी। 
                       गए  स्याम   रवि-तनया   कैं तट   अंग  लसत  चंदन  की खोरी।।
                       औचक   ही   देखी   तहँ   राधा,  नैन   विसाल   भाल   दिये रोरी। 
                       नील   बसन   फरिया   कटि   पहरे,बैनी  पीठि  रुलति झकझोरी।।
                       संग  लरिकनीं  चलि  इत आवति,दिन-थोरी,अति छवि तन गोरी। 
                       सूर    स्याम   देखत   ही   रीझे,  नैन   नैन   मिलि   परी   ठगोरी।।(सूरसागर )
          राधा और कृष्ण की सुन्दरता के साथ-साथ सूर ने उनके चातुर्य का भी वर्णन कई पदों में किया है। सुन्दरता और चतुरता में समानता के साथ-साथ राधा और कृष्ण का प्रेम भी समान है। जहाँ  राधा,कृष्ण-प्रेम में आत्म-सुधि भूल कर खाली मटकी बिलोने लगती हैं ~वहाँ कृष्ण भी राधा-प्रेम के वश वृषभ दोहन प्रारम्भ कर है ;
                        आयसु   लै   ठाढ़ी  भई ,कर  नेति सुहाई। 
                        रीतौ  माट  बिलोवई, चित्त जहाँ कन्हाई।।
                        उनके मन की कह कहौं,ज्यौं दृष्टि लगाई। 
                        लैया  नोई वृ  षभ   सों,   गैया   बिसराई।।
                        नैननि में जसुमति लखी,दुहुँ की चतुराई। 
                        सूरदास   दंपति-दसा,  कापै  कहि   जाई।। (सूरसागर)
       सूर ने अनन्य-प्रेमी राधा-कृष्ण और गोपी- कृष्ण की प्रेम लीलाओं का अत्यधिक सरस् वर्णन सूरसागर में किया है। ये प्रेम-लीलाएं संयोग और वियोग दोनों पक्षों की हैं संयोग पक्ष की लीलाओं में ~` दानलीला,मानलीला,रासलीला,जल-क्रीड़ा,झूलन,विहार आदि सभी का वर्णन किया है। यह प्राकृतिक-सुषमा भाव-उद्दीपन के सर्वथा योग्य है। रास के इस वर्णन से इसी की पुष्टि होती है:
                        बिहरत रास रंग गोपाल। 
                        नवल स्यामा संग सोहति,नवल सब ब्रजबाल।।
                        सरद निसि अति नवल उज्ज्वल,नवलता बन धाम। 
                        परम निर्मल पुलिन जमुना,कल्प तरु विस्राम।।
                       कोस द्वादस रास परिमित,रच्यो नंदकुमार। 
                        सूर-प्रभु सुख दियो निसि रमि,काम कौतुक हार।। (सूरसागर)
         सूरदास की ह्रदय-विह्वलता तथा वाक्-चातुरी उनके भ्रमर-गीत में लक्षित होती है। इन दोनों गुणों के कारण भ्रमर-गीत सूरदास की अपूर्व कृति कही  जा  सकती है।एक ओर सूर ने इसमें सभी वियोग दशाओं का वर्णन किया है दूसरी ओर भक्ति-पक्ष की पुष्टि के लिए सभी युक्तियाँ  अत्यधिक मार्मिक  दंग से प्रस्तुत की हैं।  कृष्ण की अतीत की बातों का स्मरण करती हुई राधा की  दशा का वर्णन किसी भी सहृदय पाठक को भाव-विभोर करने में समर्थ है ~~
                        मेरे मन इतनी सूल रही। 
                        वे  बतियाँ  छतियाँ  लिखि राखी,जे नंदलाल कही।।
                       एक   द्यौस    मेरे  गृह   आये,  हौं   ही  महत दही। 
                       रति मांगत मैं मान कियो,सखि,सो हरि गुसा गही।।
                       सोचति अति पछताति राधिका,मुरछित धरनि ढही। 
                       सूरदास-प्रभु   के  बिछुरे  तैं,  बिथा   न   जात   सही।। (सूरसागर)
साभार स्रोत :

  • अष्टछाप ;डा ० धीरेन्द्र वर्मा 
  • सूरसागर ;स ० नन्ददुलारे बाजपेयी
  • हिन्दी  साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • हिंदी साहित्य ;आचार्य हजारी प्रसाद  द्विवेदी
  • गो ० हरिराय जी कृत सूरदास की वार्ता ;सम्पादक प्रभुदयाल मीतल



         

           



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