मंगलवार, 13 जून 2017

परमानन्ददास

By अशर्फी लाल मिश्र
                                                                अशर्फी लाल मिश्र 

परिचय :
         महाप्रभु वल्लभाचार्य के प्रसिद्ध शिष्य परमानन्ददास का समय हिन्दी साहित्य के इतिहास-लेखकों  ने  वि ० सं ० १६०६ के आसपास स्वीकार किया है (हिन्दी साहित्य का इतिहास :आचार्य रामचन्द्र शुक्ल :१७७ ) किन्तु इनके  निश्चित जन्म संवत तथा मृत्यु संवत के सम्बन्ध में लेखकों ने कोई चर्चा नहीं की। वल्लभ सम्प्रदाय में यह प्रसिद्द है कि परमानन्ददास वल्लभाचार्य से १५ वर्ष छोटे थे। वल्लभाचार्य का जन्म १५३५ विक्रमी ,वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी को हुआ था। तदनुसार परमानन्ददास का जन्म वि ० सं ० १५५० स्थिर होता है। इस मत की पुष्टि इससे भी होती है कि परमानन्ददास अपने विवाह को टालकर अड़ेल (प्रयाग )आये और यहीं उनकी सर्वप्रथम वल्लभाचार्य से भेंट हुई। यह भेंट और दीक्षा  विक्रम संवत १५७७ में हुई। (वल्लभ दिग्विजय :गो० यदुनाथ :पृष्ठ ५३ ) ये संगीत में पारंगत थे।
         परमानन्ददास के माता-पिता के सम्बन्ध में अभी तक कुछ पता नहीं है। किन्तु उनकी वार्ता से स्पष्ट होता है कि वे कन्नौज के रहने वाले ब्राह्मण कुल के थे। (चौरासी वैष्णवन की वार्ता :पृष्ठ ७८८ ). उनके माता-पिता बहुत धनी थे अतः परमानन्ददास का  बचपन सुख-चैन से व्यतीत हुआ। बचपन से ही इनके शिक्षा की उचित व्यवस्था थी ,फलतः ये एक विद्वान ,संगीतज्ञ तथा काव्य-रचना में निपुण हो सके।
         परमानन्ददास की बचपन से  ही आध्यात्मिक चर्चा में विशेष रूचि थी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक बार  आप  मकर पर्व पर स्नान करने के लिए प्रयाग गए। वहाँ महाप्रभु वल्लभ से भेंट हो जाने पर इन्हींने उनसे दीक्षा ग्रहण की और उन्हीं के साथ रहने लगे।  इस प्रकार महाप्रभु  के साथ घूमते हुए  ये गोवर्धन पर आ गए। सुरभि कुण्ड उनका स्थाई निवास स्थान था। (परमानन्द सागर :डा० गोवर्द्धननाथ शुक्ल :भूमिका :११ ) इस स्थान पर रहते हुए वि०  संवत १६४१ में इन्होंने अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर दिया। (भाव-प्रकाश :गो० हरिराय :पृष्ठ ८३३ )

रचनाएँ :

  1. दान लीला 
  2. उद्धव लीला 
  3. ध्रुव चरित्र 
  4. संस्कृत रत्नमाला 
  5. दधि लीला 
  6. परमानन्ददास जी के  पद 
  7. परमानन्द सागर 
   उपर्युक्त ग्रन्थों में   पहले पाँच ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है छठा ग्रन्थ सातवें का ही अंगमात्र है। उनकी एक मात्र प्रामाणिक कृति परमानन्द सागर है। 

माधुर्य भक्ति :
          परमानन्ददास  के  उपास्य   रसिक नन्दनन्दन हैं। रसिक शिरोमणि तथा रस-रूप  होने के    साथ-साथ श्रीकृष्ण की रूप माधुरी भी अपूर्व है।  इस रूप-माधुरी का एक बार पान करके ह्रदय सदा  उसी के  लिए लालायित रहता है। इसी कारण कवि ने कहा है कि श्रीकृष्ण को पाकर सुन्दरता की शोभा बढ़ी है क्योंकि सौन्दर्य के वास्तविक आश्रय श्रीकृष्ण ही हैं। 
                सुन्दरता गोपालहिं सोहै। 
                कहत न बने नैन मन आनन्द जा देखत रति नायक मोहै।।
                सुन्दर   चरण  कमल   गति   सुन्दर   गुंजाफल  अवतंस। 
                सुन्दर  बनमाला उर  मंडित  सुन्दर गिरा मनों कल हंस।।
                सुन्दर  बेनु   मुकुट   मनि   सुन्दर  सब अंग स्याम सरीर। 
                सुन्दर   बदन   अवलोकनि   सुन्दर   सुन्दर  ते   बलवीर।।
                वेद पुरान  निरूपित बहु विधि ब्रह्म नराकृति रूप निवास। 
                बलि बलि जाऊँ मनोहर मूरति ह्रदय बसों परमानन्ददास।। :(परमानन्द सागर :डा० गोवर्द्धननाथ शुक्ल :पृष्ठ ४४९ )
        परमानन्ददास ने राधा और कृष्ण के प्रेम की चर्चा कई पदों में की है। दोनों का प्रेम ही सच्चा प्रेम है। .इस कारण दोनों की जोड़ी अपूर्व  है। केवल प्रेम की दृष्टि से ही नहीं वल्कि रूप और गुण दोनों में समान  हैं।  इसीलिए भक्त राधा-कृष्ण और उनकी लीलाओं का सतत गान तथा ध्यान करके आनन्द-लाभ करता है।
                 आजु बनि दम्पति वर जोरी। 
                 सांवल   गौर  बरन   रूप   निधि नन्द  किसोर ब्रजभान किसोरी।।
                 एक   सीस    पचरंग    चूनरी    एक   सीस   अद्भुत    पर    षोरी । 
                 मृगमद   तिलक  एक   के   माथे     एक   माथे  सोहै  मृदु   रोरी।।
                 नख सिख उभय भाँति भूषन छवि रितु बसंत खेलत मिलि होरी। 
                 अति   सै  रंग  बढ्यो  'परमानन्द '  प्रीति  परस्पर  नाहिन थोरी।। (परमानन्द सागर :पृष्ठ ७७ )
   
       राधा के प्रेम के अतिरिक्त  परमानन्ददास ने गोपियों के प्रेम का भी वर्णन अनेक पदों में किया है। कृष्ण की रूप माधुरी से मुग्ध गोपियाँ उनके चरणों में अपना तन,मन समर्पित कर देती हैं। कृष्ण की प्राप्ति के लिए वे कठोर से कठोर व्रत तथा उपवास आदि का पालन करती हैं। और उनके लिए वे कुल के  बन्धन ,समाज के बन्धन इहलोक तथा परलोक सभी कुछ छोड़ने को प्रस्तुत हैं इसी में आत्मसमर्पण का सर्वोत्कर्ष है :
                  अरी गुपाल सों मेरो मन मान्यों,कहा करैगो कोउ  री। 
                  हौं तो  चरन  कमल  लपटानी  जो  भावै  सो होउ  री।। 
                  माइ  रिसाई, बाप  घर  मारै,हंसे  बटाऊ   लोय    री ।
                 अब तो जिय ऐसी बनि आई विधना रच्यो संजोग री।। 
                  बरु  ये  लोक  जाइ  किन मेरो अरु परलोक नसाइ री। 
                  नंद नंदन हौं तऊ  न छाँड़ों मिलोंगी निसान बजाई री।। 
                  बहुरयो यह तन धरि कहाँ पैहौं वल्लभ भेष मुरारि री। 
                  परमानन्द स्वाभी'  के  ऊपर   सरबसु  देहौं वारि री।। (परमानन्द सागर :पृष्ठ  १५० )
        गोपियों की इस प्रेम-तीव्रता को देखकर ही कृष्ण नाना प्रकार से उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं ~
                   नैक लाल टेको मेरी बहियाँ। 
                   औघट  घाट  चढ्यो  नहिँ  जाई  रपटत  हौं कालिन्दी  महियाँ।।
                   सुन्दर स्याम कमल दल लोचन देखि स्वरुप ग़ुबाल अरुझानी। 
                   उपजी  प्रीति  काम  उर  अन्तर  तब   नागर  नागरी  पहचानी।।
                   हंसि ब्रजनाथ  गह्यो  कर  पल्लव  जाते  गगरी  गिरन न पावै। 
                   'परमानन्द 'ग्वालिन सयानी कमल नयन कर परस्योहि भावै।।(परमानन्द सागर :पृष्ठ २५३  )
          परमानन्ददास ने गोपियों और कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का वर्णन संयोग और वियोग दोनों पक्षों में किया है। संयोग पक्ष की  प्रेम-लीलाओं का आरम्भ  बाल्य कालीन लीलाओं में होता है। बचपन का यह स्नेह नाना प्रकार के हास-परिहास के बीच प्रणय में   परिवर्तित हो  जाता है। इसी हास-परिहास एवं छेड़-छाड़ का रूप हमें दानलीला के पदों में लक्षित होता है।  ऐसे ही कुछ पदों से रति-लीला की व्यंजना होती है। पर यह केवल विनोद है। इस पद की अन्तिम पंक्ति से  यह बात पूर्ण रूपेण स्पष्ट हो जाती है।
                    काहे को सिथिल किए मेरे पट। 
                    नंद  गोप  सुत  छांड़ि  अटपटी बार बार वन में कत रोकत बट।। 
                    कर लंपट परसो  न कठिन कुच अधिक बिधा रहे निधरक घट। 
                    ऐसो  बिरुध  है  खेल  तुम्हारो  पीर  न जानत गहत पराई लट।। 
                    कहूँ  न  सुनी  कबहूँ   नहिँ देखी   बाट परत  कालिन्दी  के तट। 
                    'परमानन्द 'प्रीति  अन्दर की  सुन्दर स्याम विनोद सुरत नट।। (परमानन्द सागर :पृष्ठ ५८ )
        परमानन्ददास ने अपने पदों में राधा-कृष्ण अथवा गोपी-कृष्ण के विलास का स्पष्ट रूप से कहीं भी वर्णन नहीं किया है।  उन्होंने विलास का केवल संकेत मात्र अपने पदों में किया है। यद्यपि गोपियों में भी श्रीकृष्ण को पति रूप में प्राप्त  इच्छा लक्षित होती है,किन्तु उसकी स्थिति राधा से भिन्न है। सिद्ध और साधक में जो अन्तर है वही अन्तर हमें राधा और गोपियों में लक्षित होता है। यही कारण है कि कृष्ण राधा के चरण-चाँपते हुए भी हमारे सम्मुख आते हैं,किन्तु गोपियाँ सर्वत्र कृष्ण की पद-वन्दना करते हुए दृष्टिगत होती हैं ,गोपियाँ रति की अभिलाषा करती हैं ,किन्तु रति-सुख केवल राधा को ही प्राप्त होता है :
                     मदन गोपाल बलैये लैहौं। 
                     बृंदा  बिपिन  तरनि  तनया  तट  चलि ब्रजनाथ आलिंगन दैहौं।।
                     सघन निकुंज सुखद रति आलय नव कुसुमनि की सेज बिछैहौं। 
                     त्रिगुन समीर पंथ पग बिहरत मिलि तुम संग सुरति सुख पैहौं।।
                     अपनी  चोंप   ते  जब   बोलहुगे   तब  गृह  छाँड़ि  अकेली   ऐहौं। 
                     'परमानन्द 'प्रभु  चारु बदन कौ उचित उगार मुदित  ह्वै खैहौं।।(परमानन्द सागर :पृष्ठ १२३ )
       तथा ~
                   राधे जू हारावली टूटी। 
                   उरज कमल दल माल   अरगजी वाम कपोल अलक  लट छूटी।।
                   बर  उर  उरज  करज  कर  अंकित बांह जुगल बलयावलि फूटी। 
                    कंचुकी  चीर  बिबिध  रंग  रंगति  गिरधर  अध र माधुरी घूटी।।
                   आलस  बलित   नैन  अनियारे   अरून   उनींदे   रजनी    षूटी। 
                   'परमानन्द ' प्रभु सुरत  सने  रस मदन  नृपति  की सेवा लूटी।।(परमानन्द सागर :पृष्ठ १३८ )

साभार स्रोत:








  • परमानन्द सागर :डा० गोवर्द्धननाथ शुक्ल 
  • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
  • हिन्दी साहित्य का इतिहास :आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
  • वल्लभ दिग्विजय :गो० यदुनाथ
  •  चौरासी वैष्णवन की वार्ता
  •  भाव-प्रकाश :गो० हरिराय



  •                              


    शुक्रवार, 9 जून 2017

    वात्सल्य रस के प्रधान कवि : सूरदास

     By :अशर्फी लाल मिश्र
    अशर्फी लाल मिश्र 
                                                 
                                                                             
    सूरदास 
                                                                                                                                    
      सूरदास  की प्रशंसा में ठीक ही कहा गया है कि

                            सूर    सूर   तुलसी   शशि ,  उडगन  केशवदास | 
                           अब के सब खद्योत सम ,जँह तँह करत प्रकास || 

    इतिवृत्त :सूरदास उन कवियों में से  हैं,जिन पर केवल वल्लभ सम्प्रदाय को नहीँ वरन हिंदी साहित्य को गर्व है। इसी कारण इनके विषय में अधिक से   अधिक जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न हुआ है। इनके जीवन-चरित पर प्रकाश  डालने के लिए साहित्य के इतिहासकारों तथा अनुसन्धान कर्ताओं ने अन्तः साक्ष्य और बाह्य साक्ष्य दोनों का ही आश्रय लिया है और जहाँ इनसे भी काम नहीं चला वहाँ अनुमान से सहायता ली गई। इसी कारण इनके जन्म संवत आदि के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है।
      *आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूरदास का जन्म-संवत १५४० विक्रमी और मृत्यु-संवत १६२० विक्रमी माना है। (हिंदी साहित्य का इतिहास :पृष्ठ १६१ ) आचार्य शुक्ल की यह मान्यता मुख्य रूप से साहित्य लहिरी पर आधारित है।
    *आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि साहित्य लहिरी के रचयिता यही प्रसिद्ध सूरदास थे या कोई अन्य। अतः उन्होंने आचार्य शुक्ल की मान्यता विवाद रहित स्वीकार नहीं किया (हिंदी साहित्य :पृष्ठ १७६-७७).। स्वयं द्विवेदी जी ने सूरदास के जन्म-संवत आदि  के विषय में कोई निश्चित मत नहीं दिया। किन्तु सूरदास के समय की जो रूपरेखा उनके इतिहास में मिलती है ~ वह प्रायः वही है जो आचार्य शुक्ल की है।
    *डा ० दीनदयाल गुप्त ने इनका जन्म-संवत १५५५ विक्रमी और मृत्यु-संवत १६ ३ ८  अथवा १६३९ है।
    *डा ० मुंशीराम शर्मा का मत इन सभी विद्वानों से भिन्न है। उन्होंने सूर-सौरभ में प्रदत्त अन्तःसाक्ष्य और बाह्य साक्ष्य के आधार पर यह सिद्ध किया है कि सूरदास संवत १५५५ के  लगभग उत्पन्न हुए और संवत १६२ ८ के आस-पास तक जीवित रहे। (सूर-सौरभ :पृष्ठ ५३ ) .
             'चौरासी वैष्णवन की वार्ता ' के अनुसार सूरदास का जन्म स्थान रुनकता या रेणुका क्षेत्र है। श्री हरिराय जी की वार्ता से पता चलता है कि सूरदास दिल्ली से चारकोस (१२ किलोमीटर ) दूर सीही ग्राम के सारस्वत कुल में पैदा हुए थे। (गो ० हरिराय जी कृत सूरदास की वार्ता ;सम्पादक प्रभुदयाल मीतल :पृष्ठ १-२ ).
    *श्री वल्लभाचार्य जी की भेंट के समय मथुरा-वृन्दावन के बीच गऊघाट पर रहा करते थे। सूरदास स्वभाव से विरक्त थे अतः एकान्त में भगवान् के समक्ष अपने भाव व्यक्त किया करते थे। इनके इसी विरक्त-भाव से आकर्षित होकर इनके सेवक बन गए। उस समय के पदों में इन्होंने अपने आपको अशुची ,अकृती ,अपराधी  आदि कहा है। पर वल्लभाचार्य से मिलने के उपरान्त सूर  वास्तव में 'सूर ' हो गए और अपनी भक्ति-निष्ठां तथा अनन्यता के आधार पर एक दिन भगवान् से यह कहने का  साहस भी कर सके ~~
                               बाँह छुड़ाए जात हो निबल जानि के मोहि। 
                               हिरदै  तै  जब  जाहुगे  मरद  बदौंगो तोहि।। 
               कुछ विद्वानों का विचार है कि सूरदास जन्मांध थे,अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। (हिंदी साहित्य ;आचार्य हजारी प्रसाद  द्विवेदी :पृष्ठ :१७३-७४ ) दोनों मतों में से कौनसा  ठीक है , यह निर्णय करना सहज नहीं है। किन्तु तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य वल्लभ से भेंट के समय सूरदास चर्मचक्षुओं की सेवा से रहित थे। इसीलिये आचार्य को इनके अंतर्नयनोंं  को खोल देने में विशेष असुविधा नहीं हुई तत्पश्चात सूरदास ने भगवान् की लीलाओं में ही अपने आप को लीन कर दिया।
                गोकुलनाथ कृत वार्ताओं से पता चलता है कि सूरदास को महाप्रभु ने श्रीनाथ जी की कीर्तन सेवा सौंपी थी। अतः इसी सेवा के निर्वाह-निमित्त इन्होंने लीला-सागर की रचना की। किन्तु श्रीनाथ जी की इस सेवा को इन्हें विवश होकर शीघ्र ही छोड़ना पड़ा। तदुपरान्त ये भगवान् की रास-क्रीड़ा-भूमि परासौली गांव में चले गए और वहीं पर एक दिन अपनी चित्त-वृत्तियों को राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं में नियोजित कर यह गीत गाते  हए~~         
                               बलि  बलि  बलि  हो  कुमर  राधिका नंदसुवन जासों  रति मानी। 
                               वे अति चतुर तुम चतुर शिरोमनि प्रीति करी कैसे होत है छानी।।
                               वे  जु  धरत  तन  कनक  पीत  पट  सो  तो  सब तेरी गति ठानी। 
                               ते  पुनि   श्याम  सहेज  वे   शोभा अंबर मिस अपने उर  आनी।।
                               पुलकित अंग अब ही ह्वै आयो निरखि  देखि निज देह सिरानी। 
                              सुर    सुजान   सखी    के   बूझे   प्रेम   प्रकश   भयो   बिहसानी।।
    भगवान् की लीला में लीन हो गए।

    काव्य-रचना :

    • सूरसागर 
    • सूर-सारावली (सूरसागर की अनुक्रमणिका )
    • साहित्य-लहरी (कुछ विद्वानों के मतानुसर )
    माधुर्य भक्ति :
              सूरदास ने अपने उपास्य राधा-कृष्ण के स्वरुप को निम्न पद के द्वारा स्पष्ट किया है ;
                           ब्रजहिं बसे आपुहि बिसरायो। 
                           प्रकृति  पुरुष   एकै   करि   जानों  बातन   भेद  करायो।।
                           जल थल जहाँ रहो तुम बिन नहिं भेद उपनिषद गायो। 
                           द्वै  तनु जीव  एक हम तुम दोऊ सुख कारन उपजायो।।
                           ब्रह्म  रूप  द्वितीया  नहिं कोई तव मन त्रिया जनायो। 
                           सूर  स्याम मुख देखि अलप हँसि  आनन्द पुंज बढ़ायो।।(सूरसागर ;स ० नन्ददुलारे बाजपेयी;पृष्ठ ८४१)
              स्पष्ट है कि राधा प्रकृति है और कृष्ण पुरुष हैं। अपने इस रूप में अभिन्न हैं। किन्तु लीला-विस्तार के लिए तथा भक्ति के प्रसार के लिए उन्होंने दो शरीर धारण किये हैं :
                           प्रान  इक  द्वै देह कीन्हें,भक्ति-प्रीति-प्रकास। 
                           सूर-स्वाम  स्वामिनी मिलि,करत रंग-विलास।। 
               राधा और कृष्ण का प्रेम सहज है ~ क्योंकि उसका विकास धीरे-धीरे बाल्य-काल से ही हुआ है। दोनों का प्रथम परिचय रवि-तनया के तट पर सहज रूप से होता है। एक दूसरे के सौन्दर्य,वाक्चातुरी तथा क्रीड़ा-कला पर मुग्ध वे परस्पर स्नेह-बंधन में बंध जाते हैं। यही उनके प्रेम का प्रारम्भ है :
                            बूझत स्याम कौन तू गोरी। 
                            कहाँ  रहति  काकी  है   बेटी,  देखी    नहीं   कहूँ   ब्रज    खोरी।।
                            काहे  कौं   हम  ब्रज-तन  आवति,  खेलति  रहति आपनी पोरी। 
                            सुनत रहति स्रवननि नंद-ढोटा,करत फिरत माखन दधि चोरी।।
                            तुम्हरौ   कहा  चोरि   हम   लैहैं,  खेलन  चलौ संग मिलि जोरी। 
                            सूरदास   प्रभु   रसिक-सिरोमनि   बातनि  भुरइ राधिका भोरी।।(सूरसागर: पृष्ठ ४९७ )
              राधा और कृष्ण का सौन्दर्य भी अपूर्व है। निम्न पद में वर्णित राधा और कृष्ण दोनों का सौन्दर्य दर्शनीय है ~~ 
                           खेलन हरि  निकसे ब्रजखोरी। 
                           कटि   कछनी    पीताम्बर   बाँधे,  हाथ    लए   भौंरा,   चकडोरी।।
                           मोर-मुकुट,कुंडल स्रवननि बर,दसन-दमक दामिमि-छवि छोरी। 
                           गए  स्याम   रवि-तनया   कैं तट   अंग  लसत  चंदन  की खोरी।।
                           औचक   ही   देखी   तहँ   राधा,  नैन   विसाल   भाल   दिये रोरी। 
                           नील   बसन   फरिया   कटि   पहरे,बैनी  पीठि  रुलति झकझोरी।।
                           संग  लरिकनीं  चलि  इत आवति,दिन-थोरी,अति छवि तन गोरी। 
                           सूर    स्याम   देखत   ही   रीझे,  नैन   नैन   मिलि   परी   ठगोरी।।(सूरसागर )
              राधा और कृष्ण की सुन्दरता के साथ-साथ सूर ने उनके चातुर्य का भी वर्णन कई पदों में किया है। सुन्दरता और चतुरता में समानता के साथ-साथ राधा और कृष्ण का प्रेम भी समान है। जहाँ  राधा,कृष्ण-प्रेम में आत्म-सुधि भूल कर खाली मटकी बिलोने लगती हैं ~वहाँ कृष्ण भी राधा-प्रेम के वश वृषभ दोहन प्रारम्भ कर है ;
                            आयसु   लै   ठाढ़ी  भई ,कर  नेति सुहाई। 
                            रीतौ  माट  बिलोवई, चित्त जहाँ कन्हाई।।
                            उनके मन की कह कहौं,ज्यौं दृष्टि लगाई। 
                            लैया  नोई वृ  षभ   सों,   गैया   बिसराई।।
                            नैननि में जसुमति लखी,दुहुँ की चतुराई। 
                            सूरदास   दंपति-दसा,  कापै  कहि   जाई।। (सूरसागर)
           सूर ने अनन्य-प्रेमी राधा-कृष्ण और गोपी- कृष्ण की प्रेम लीलाओं का अत्यधिक सरस् वर्णन सूरसागर में किया है। ये प्रेम-लीलाएं संयोग और वियोग दोनों पक्षों की हैं संयोग पक्ष की लीलाओं में ~` दानलीला,मानलीला,रासलीला,जल-क्रीड़ा,झूलन,विहार आदि सभी का वर्णन किया है। यह प्राकृतिक-सुषमा भाव-उद्दीपन के सर्वथा योग्य है। रास के इस वर्णन से इसी की पुष्टि होती है:
                            बिहरत रास रंग गोपाल। 
                            नवल स्यामा संग सोहति,नवल सब ब्रजबाल।।
                            सरद निसि अति नवल उज्ज्वल,नवलता बन धाम। 
                            परम निर्मल पुलिन जमुना,कल्प तरु विस्राम।।
                           कोस द्वादस रास परिमित,रच्यो नंदकुमार। 
                            सूर-प्रभु सुख दियो निसि रमि,काम कौतुक हार।। (सूरसागर)
             सूरदास की ह्रदय-विह्वलता तथा वाक्-चातुरी उनके भ्रमर-गीत में लक्षित होती है। इन दोनों गुणों के कारण भ्रमर-गीत सूरदास की अपूर्व कृति कही  जा  सकती है।एक ओर सूर ने इसमें सभी वियोग दशाओं का वर्णन किया है दूसरी ओर भक्ति-पक्ष की पुष्टि के लिए सभी युक्तियाँ  अत्यधिक मार्मिक  दंग से प्रस्तुत की हैं।  कृष्ण की अतीत की बातों का स्मरण करती हुई राधा की  दशा का वर्णन किसी भी सहृदय पाठक को भाव-विभोर करने में समर्थ है ~~
                            मेरे मन इतनी सूल रही। 
                            वे  बतियाँ  छतियाँ  लिखि राखी,जे नंदलाल कही।।
                           एक   द्यौस    मेरे  गृह   आये,  हौं   ही  महत दही। 
                           रति मांगत मैं मान कियो,सखि,सो हरि गुसा गही।।
                           सोचति अति पछताति राधिका,मुरछित धरनि ढही। 
                           सूरदास-प्रभु   के  बिछुरे  तैं,  बिथा   न   जात   सही।। (सूरसागर)
    साभार स्रोत :

    • अष्टछाप ;डा ० धीरेन्द्र वर्मा 
    • सूरसागर ;स ० नन्ददुलारे बाजपेयी
    • हिन्दी  साहित्य का इतिहास: आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
    • हिंदी साहित्य ;आचार्य हजारी प्रसाद  द्विवेदी
    • गो ० हरिराय जी कृत सूरदास की वार्ता ;सम्पादक प्रभुदयाल मीतल
    ©  अशर्फी  लाल मिश्र



    बुधवार, 7 जून 2017

    राजवंश से वैराग्य की ओर :मीराबाई



    By : अशर्फी लाल मिश्र  
    अशर्फी लाल मिश्र 
                                                                                                                                                                    
    मीराबाई 
                                                                         


                 प्रसिद्ध कवियत्री मीरा जिनके पदों का गायन उनकी भक्ति भावना तथा गेयता एवं मधुरता के कारण भारत के प्रायः सभी  भागों में होता है,राजस्थान की रहने वाली थीं। मीरा  से साधारण जनता तथा विद्वानों का परिचय उनके गीतों के कारण  था। ये गीत भी लिखित रूप में न होने के कारण अपने आकार-प्रकार में भाषा और भाव की दृष्टि से बदलते चले गए। इसी का यह परिणाम हुआ कि आज एक भाव के पद विभिन्न भाषाओँ में विभिन्न रूपों में उपलब्ध होते हैं किन्तु इन पदों द्वारा प्राप्त प्रसिद्धि के कारण साहित्यिक तथा ऐतिहासिक विद्वानों की जिज्ञासा मीरा के सम्बन्ध में आवश्यक परिचय प्राप्त करने की हुई। ऐतिहासिक दृष्टि से कर्नल टॉड तथा स्ट्रैटन ने इनके जीवन पर प्रकाश डालने की चेष्टा की और मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ ने मीराबाई  का जीवन और उनका काव्य यह पुस्तक लिखकर सर्व प्रथम साहित्यिक दृष्टि से उनके सम्बन्ध में विद्वानों को परिचित कराया।

    जीवन वृत्त :
             मीराबाई जोधपुर के संस्थापक सुप्रसिद्ध ,राठौड़ राजा राव जोधा जी के पुत्र राव दूदा जी की पौत्री तथा रत्नसिंह जी की पुत्री थीं। इनका जन्म कुड़की गाँव में वि ० सं ० १५५५ के आस-पास हुआ था। मीराबाई का श्री गिरधरलाल  के प्रति बचपन से ही सहज प्रेम था। किसी साधु से गिरधरलाल की एक सुन्दर मूर्ति इन्हें प्राप्त हुई। मीरा उस मूर्ति को सदा अपने पास रखतीं और समयानुसर उसकी स्नान,पूजा,भोजन आदि की स्वयं व्यवस्था करतीं। एक बार माता से परिहास में यह जानकर की मेरे दूल्हा ये गिरधर गोपाल हैं ~~ मीरा का मन इनकी ओर और भी अधिक झुक गया और ये गिरधर लाल को अपना सर्वस्व समझने लगीं।
             यद्यपि मीरा का जन्म अच्छे कुल में हुआ और उनका लालन-पालन भी बहुत स्नेह से हुआ तथापि बचपन से उन्हें कष्टप्रद घटनाओं को सुनना व् देखना पड़ा। मीराबाई की माता  उनकी बाल्यावस्था में परलोक सिधार गईं। पिता को लड़ाइयों से कम अवकाश मिलता था अतः इनको राव दूदा जी ने अपने पास मेड़ता बुला लिया। वहाँ उन्हें अपने पितामह के स्नेह के साथ-साथ उनके धार्मिक भाव भी प्राप्त हुए और इस प्रकार मीरा के गिरधर प्रेम का अंकुर यहाँ पल्लवित हो उठा। राव दूदा जी की मृत्यु के उप्ररान्त उनके बड़े पुत्र राव वीरमदेव जी ने इनका पालन-पोषण किया।
              सं ० १५७३ विक्रमी में मीरा का विवाह मेवाड़ के प्रसिद्ध महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र कुँवर भोजराज के साथ हुआ। मेवाड़ में आकर इनका वैवाहिक जीवन अत्यधिक सुख से व्यतीत होने लगा। किन्तु यह सुख कुछ समय ही रहा। कुँवर भोजराज शीघ्र मीरा को विधवा बनाकर इस संसार से सदा के लिए चले गए। मीरा ने यह दुःसह वैधव्य का समय किसी प्रकार गिरधरलाल की उपासना में व्यतीत करने का निश्चय किया। कुछ वर्ष उपरान्त मीरा के पिता और श्वसुर दोनों का देहान्त हो गया। इन घटनाओं से मीरा का  मन संसार से बिल्कुल विरक्त हो गया और वे अपना अधिक से अधिक समय भगवदभजन और साधु सत्संग में व्यतीत करने लगीं। धीरे-धीरे उन्होंने लोक-लाज त्यागकर प्रेमवश भगवान के मन्दिरों में नाचना प्रारम्भ कर दिया।
             किन्तु ये बातें मेवाड़ के प्रतिष्ठित राजवंश की मर्यादा के विरुद्ध जान पड़ी अतः महाराणा सांगा के द्वितीय पुत्र रत्नसिंह और उनके छोटे भाई विक्रमजीतसिंह को इनका यह भक्ति भाव विल्कुल न रचा। विक्रमजीतसिंह ने नाना प्रकार के उचित अनुचित साधनों से मीराबाई की इहलीला समाप्त करने की पूरी चेष्टा की। इन अत्याचारों का उल्लेख स्वयं मीरा ने अपने गीतों में किया है :                
                         मीरा मगन भई हरि के गुण गाय। 
                        सांप   पिटारा  राणा  भेज्यो,मीरा हाथ दियो जाय।।
                        न्हाय धोय जब देखण लागी ,सालिगराम गई पाय। 
                        जहर का प्याला राणा भेज्या ,अमृत दीन्ह बनाय।।
                        न्हाय  धोय   जब   पीवण  लागी   हो अमर अंचाय। (मीरा की पदावली :पद  ४५ )
                 इस प्रकार के अत्याचारों से तंग आकर मीरा अपने पीहर मेड़ता चली गई। किन्तु कुछ समय बाद मेड़ता  का  राज्य मीरा के चाचा वीरमदेव के हाथ से चला गया। इस घटना से प्रोत्साहित होकर मीरा तीर्थयात्रा के लिए निकल पड़ी और वृन्दावन  होते हुए द्वारिका  गई। वहीं ये रणछोड़ भगवान  भक्ति में तल्लीन  लगीं। प्रसिद्ध है कि अन्तिम समय में मीरा को बुलाने के लिए उनके पीहर  ससुराल वालों ने ब्राह्मण भेजे किन्तु ये फिर वापस न   लौट सकीं। वि ० सं ० १६०३ में  द्वारका में ही इनका देहान्त हो गया।
    रचनाएँ :
         मीरा की जिन रचनाओं की चर्चा  विद्वानों ने की है वे निम्न प्रकार हैं :
    1. नरसी जी रो माहेरो 
    2. गीत गोविन्द  की टीका 
    3. राग गोविन्द 
    4. सोरठ के पद 
    5. मीराबाई की मलार 
    6. गर्वागीत 
    7. फुटकर पद 
    मीरा के जितने भी पद अद्यावधि प्राप्त हुए हैं ~`चाहे वह किसी भी भाषा अथवा किसी रूप में क्यों न हों उनको फुटकर पदों के रूप में संग्रहीत कर दिया गया है। (मीरा-वृहद्-पद-संग्रह :सम्पादक -पद्मावती शबनम )

    माधुर्य भक्ति :
              मीरा ने कृष्ण को अपना पति माना है। इस प्रकार अपने को कृष्ण की पत्नी मानकर उन्होंने कृष्ण की मधुर-लीलाओं का आस्वादन किया। उनमें सन्त मत के प्रभाव के कारण रहस्य की छाप पूर्ण रूप में देखी जा सकती है :
                              मैं गिरधर रंग राती ,सैयाँ मैं। 
                              पचरंग  चोला  पहर   सखी  मैं,  झिरमिट  खेलन   जाती।
                              ओह झिरमिट माँ  मिल्यो साँवरो ,खोल मिली तन गाती।
                              जिनका  पिया  परदेश  बसत  है,लिख  लिख  भेजें  पाती।
                              मेरा  पिया   मेरे   हिये   बसत   है,  ना  कहुँ  आती जाती। 
                              चंदा   जायगा  सूरज   जायगा,  जायगी  धरणि   अकासी।।
                              पवन   पाणी   दोनुं  ही   जायेंगे,  अटल   रहे   अविनासी। 
                              सुरत   निरत  का दिवला  संजोले,मनसा की करले बाती।।
                              प्रेम   हटी   का   तेल   मंगाले   जगे   रह्या दिन ते राती। 
                              सतगुरु   मिलिया   साँसा   भाग्या,  सैन   बताई    साँची।
                              ना     घर   तेरा   न    घर    मेरा,   गावे   मीरा     दासी।।(मीराबाई की पदावली :पद सं ० २० )
             अन्यथा मीरा का सारा समय प्रियतम से यही प्रार्थना करते व्यतीत होता है :
                              गोविंद कबहुँ मिले पिया मोरा। 
                              चरण कंवल कूं हंसि-हंसि देखू राखूं नेणा नेरा।।
                              निरखण कूं मोहि चाव घणेरो,कब देखूं मुख तेरा। 
                              व्याकुल प्राण धरत नहिं धीरज,मिलि तूं मीत सवेरा। 
                              मीरा के प्रभु हरि गिरधर नागर,ताप तपन बहुतेरा।। (मीराबाई की पदावली :पद १११ )

               मीरा के  प्रियतम गिरधर नागर मोर मुकुट धारी हैं उनके गले में वैजयन्ती माला फहरा रही है। पीताम्बर धारण किये वे वन-वन में गायें चराते हैं। कालिन्दी तट पर पहुँच कर शीतल कदम्ब की छाया में सुखासीन हो मधुर मुरली बजाते हैं। इस प्रकार अपनी सहज माधुरी से गोपियों को मोहित कर उनसे रास आदि क्रीड़ाएँ  करते हैं.इसी मोहन लाल की माधुरी-छवि मीरा के मन में बस गई हैऔर वे उस पर अपना तन मन वर्ण को प्रस्तुत हैं। `उस मोहन के मोहित करने वाले रूप को देखकर मीरा के नेत्रों को सतत उन्हीं को देखने की आदत बन गई है।  वह  अपनी इस स्थिति को अपनी सखी के सम्मुख इस प्रकार प्रस्तुत करती है:
                          आली री मेरे नेणाँ  बाण परी। 
                          चित्त चढ़ी मेरे माधुरी मूरत,उर बिच आन अड़ी। 
                          कब  की   ठाढ़ी  पंथ   निहारूँ ,  अपने भवन खड़ी।।
                           कैसे  प्राण  पिया  बिन  राखूं,  जीवन  मूर   जड़ी। 
                          मीरा   गिरधर  हाथ  विकानी  लोग  कहैं  बिगड़ी।।(मीराबाई की पदावली :पद ११ )
               और अपनी इस स्थिति के आधार वे दृढ़ता पूर्वक कहती हैं :
                          मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई। 
                          जाके  सिर मोर मुकुट,मेरे  पति सोई------।।(मीराबाई की पदावली :पद १५  )
               साँवरे के रंग में रंग कर वे समस्त लोक-लाज का त्याग कर देती हैं। गिरधर लाल की प्रेम की तीव्रता में उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि ~~    मेरी उनकी प्रीति पुराणी अतः  मीरा अपना सर्वस्व कृष्ण-चरणों में न्यौछावर कर स्वयं उनकी दासी बन जाती है।मीरा जिन प्रभु की चरणों में आत्म-समर्पण करती है वह सामान्य प्रियतम नहीं हैं ,जिनसे सहज ही भेंट हो जाय। अतः उनकी यह उक्ति " दरद की मारी मैं वन-वन डोलूं "उनकी प्रेम- स्थिति का  सुन्दर परिचय देती है.। कृष्ण- प्राप्ति के लिए वे लाख प्रयत्न करती हैं ~~ यहाँ तक कि आभूषण,वस्त्र आदि उतार कर वैरागिन का   वेश धारण कर  लेती हैं ,किन्तु प्रियतम उन्हें अपने  साक्षात्कार से कृतार्थ नहीं करते। प्रियतम की इस विमुखता से जहाँ उन्हें अत्यधिक संताप होता है वहाँ कुछ-कुछ खीझ भी उनके मन में उठती है और इसी खीझवश   वे अपनी सखी से कहती हैं :
                            देखो सहियाँ हरि मन  काठो कियो।
                            आवन कह गयो अजूं न आयो,करि करि बचन गयो। 
                            खान पान सुध बुध सब बिसरी,कैसे,करि मैं   जियो।।
                            बचन   तुम्हारे तुमहीं  बिसारे,मन  मेरो  हर   लियो। 
                            मीरा  कहे  प्रभु  गिरधर नागर,तुम बिन फटत हियो।।(मीराबाई की पदावली :पद ५६ )
         मीरा प्रियतम से मिलने के लिए नाना प्रकार के उपवास ,व्रत आदि करती हैं जिनके फलस्वरूप सूखे पत्ते की भाँति पीली पड़ जाती है ,सूखकर काँटा  जाती है किन्तु उनकी व्यथा को शान्ति किसी प्रकार नहीं मिलती। अन्ततः जब उनका ह्रदय इस पीड़ा से अत्यधिक व्यथित हो उठता है तब वह अपनी पीड़ा को कम करने के लिए उसे इस प्रकार प्रकट कर देती हैं ~~
                            सखी मेरी नींद नसानी हो। 
                             पिय  को  पंथ  निहारत,सिगरी  रैण  बिहानी   हो।। 
                            सब सखियन मिली सीख दई,मन एक न मानी हो। 
                            बिनि  देख्याँ  कल  नाहिं  पड़त,जिय ऐसी ठानी हो।। 
                            अंगि  अंगि  ब्याकुल  भई,मुख  पिय  पिय बानी हो। 
                            अन्तर  वेदन  बिरह   की, वह  पीड़ा  न  जानी   हो।। 
                            ज्यूँ  चातक   घन   को  रटे, मछरी  जिमि पानी हो। 
                            मीरा  ब्याकुल  बिरहणी, सुध   बुध   बिसरानी  हो।। (मीराबाई की पदावली :पद ८७  )
    कवियत्री ने एकाध पद में वृन्दावन का वर्णन भी किया है ~~
                            आली म्हाने लागे वृन्दावन नीको। 
                            घर-घर  तुलसी ठाकुर पूजा,दरसण  गोविंद  जी को।
                            निरमल   नीर  बहुत  जमुना में,भोजन दूध दही को। 
                           रतन सिंघासण आप बिराजे,मुकुट धरयो तुलसी को।.
                           कुंजन-कुंजन फिरत  राधिका,सबद सुणत  मुरली को। 
                           मीरा  के  प्रभु गिरधर  नागर, भजन  बिना  नर  फीको।।(मीराबाई की पदावली :पद १६३  )

          साभार स्रोत :

    • मीराबाई का जीवन और उनका काव्य : मुंशी देवी प्रसाद मुंसिफ   
    •  मीरा की पदावली  
    •   मीरा-वृहद्-पद-संग्रह :सम्पादक -पद्मावती शबनम )  
    •  ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:  :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७          






    सोमवार, 5 जून 2017

    छीतस्वामी

    By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                  अशर्फी लाल मिश्र 

    जीवन परिचय :
             छीतस्वामी की वल्लभ सम्प्रदाय के भक्त कवियों में गणना की जाती है। गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य होने के पूर्व ये मथुरा के पंडा थे। उस समय उन्हें पैसे का कोई आभाव न था। अतः ये स्वभाव से उद्दंड और अक्खड़ थे किन्तु विट्ठलनाथ से दीक्षा लेने के पश्चात् इनके स्वभाव में अत्यधिक परिवर्तन आ गया और वह नम्र और सरल हो गए। डा ० दीनदयाल गुप्त ने इनका जन्म संवत १५६७ वि ० माना है। (अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय :पृष्ठ २७८ ) .दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता में छीतस्वामी के विषय में जो कुछ लिखा गया है उसके अनुसार ये यदा कदा पद बनाकर विट्ठलनाथ  जी को सुनाया करते थे। इन पदों से प्रसन्न  होकर एक बार विट्ठलनाथ जी ने इन पर कृपा की ,जिससे छीतस्वामी को साक्षात् कोटि कंदर्प लावण्य-मूर्ति पुरुषोत्तम के दर्शन हुए। इन दर्शनों से उनके पदों में मधुर भाव-धारा बह उठी। 

    काव्य रचना :
    *स्फुट पद (वर्षोत्सव ग्रंथों में )
    वर्ण्य विषय :कृष्ण जन बधाई ,कृष्ण की लीलाएं ,गोस्वामी जी स्तुति ,ब्रज-महिमा

    माधुर्य भक्ति :
              छीतस्वामी के आराध्य कृष्ण कृपालु तथा दयालु हैं। वे राधारमण और गोपीवल्लभ हैं। वे नाना प्रकार की लोलाओं का विधान करके भक्तों को सुखी करते हैं। इस प्रकार के उनमें अनेक गुण हाँ जिनका वर्णन करना सम्भव नहीं है :
                          मेरी अखियन के भूषन गिरधारी। 
                          बलि बलि जाऊँ छबीली छवि पर अति आनन्द सुखकारी।।
                          परम उदार चतुर चिन्तामणि दरस परस दुख हारी। 
                          अतुल प्रताप तनक तुलसी दल मानत सेवा भारी।।
                          छीत स्वामी गिरिधरन विशद यश गावत गोकुल नारी। 
                          कहा बरनौं गुनगाथ नाथ के श्री विट्ठल ह्रदय विचारी।। (छीतस्वामी का पद संग्रह )
           कृष्ण-रूप माधुरी तथा गुण माधुरी  से मुग्ध  होकर गोपियों ने श्रीकृष्ण के  सौन्दर्य   का परिचय निम्न  शब्दों में :
                          अरी हौं स्याम रूप लुभानी। 
                          मारग जात मिले ननदनन्दन तन की दशा भुलानी।।
                          मोर  मुकुट   सीस  पर  बाको  बांकी   चितवन  सोहे। 
                          अंग    अंग    भूषन   बने   सजनी   देखे   सो    मोहे।।
                          मोतन   मुरि  के   जब  मुसकाने   तब हौं छाकि रही। 
                          छीतस्वामी गिरधर की  चितवन जाति न कछु कही।। 
              छीतस्वामी ने कृष्ण की मधुर लीलाओं में संयोग की लीलाओं का विशेष रूप से वर्णन किया है। इनमें सुरत और सुरतान्त छवि के पद अधिक हैं और इनका वर्णन सुन्दर  तथा सरस है :
                           सुभग स्याम के अंग राधा विराजे। 
                           नैन आलस भरी सकल निसि सुखकरी कंठहारि भुज धरी स्याम लाजे।।
                           मनक  कंचन  तनी  पीक   दृग  सो  सनी  अति ही रस में बनी रूप भ्राजे। 
                           छीतस्वामी   गिरिधरन  के मन बसी मन ही मन हँसी सुख दियौ आजे।।
             भावोद्दीपन के लिए छीतस्वामी ने वसन्त और पावस ऋतू का सुन्दर वर्णन किया है। वसन्त के इस वर्णन में एक और ऋतु  के समागम से वृन्दावन में जो सुषमा छा गई है ,उसका चित्रण किया गया है :
                          आयो ऋतू राज साज पंचमी बसंत आज ,
                                     बौरे द्रुम  अति अनूप रहे फूली। 
                          बेली पट पीत माल ,सेत पीत कुसुम लाल ,
                                      उढवति,सब स्याम भाम भँवर रहे झूली।।
                         रजनी अति भई स्वच्छ ,सरिता सब विमल पच्छ,
                                       उडगन पति अति अकास बरखत रस मूली। 
                          जती सती सिद्ध साध जित तित तें उठे भाग ,
                                        बिमन सभी तपसी मुनि मन गति भूली।।
                          जुवति जूथ करति केलि ,स्याम सुखद सिंधु झेलि,
                                        लाज लीक दई पेलि ,परसि पगन तूली। 
                           बाजत पखावज उपंग बाँसुरी ,मृदंग, चंग,
                                        यह सब सुख 'छीत' निरखि इच्छा अनुकूली।।
              रास में प्रवेश पा कृष्ण  के साथ विलास करना छीतस्वामी के जीवन का लक्ष्य है। यह विलास सदा ब्रजभूमि में होता ही रहता है। अतः छीतस्वामी विधाता से जन्म-जन्म में ब्रज-निवास की याचना करते हैं। निम्न कवित्त से उनके उपासक का स्वरुप विल्कुल स्पष्ट हो जाता है:
                              अहो विधना ! तो पै अंचरा पसारि मांगों,
                                                 जनम जनम दीजो मोहि ब्रज बसिबो। 
                              अहीर की जाति समीप नन्द घर हेरि,
                                                  हेरि स्याम सुभग घरी घरी हँसिबो।।
                             दधि के दान मिस ब्रज की बीथिन,
                                                   झकझोरन   अंग  अंग को  परसिबो। 
                             छीत स्वामी गिरिधर श्री विट्ठल,
                                                   सरद   रैन   रस    रास   बिलसिबो।।
    साभार स्रोत:

    • अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय:डॉ दीनदयाल गुप्त  
    •  सौ बावन वैष्णवों की वार्ता
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण: :हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 


    शनिवार, 3 जून 2017

    गोविन्दस्वामी

    By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                              अशर्फी लाल मिश्र 

    जीवन परिचय :
                 गोविंदस्वामी की वल्लभ सम्प्रदाय  भक्त कवियों में गणना की जाती है। ये गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य थे। इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण कुल में हुआ था  तथा  अंतरी  के रहने वाले थे। (हिंदी साहित्य का इतिहास :आचार्य रामचन्द्र शुक्ल :पृष्ठ १७९ ) यहीं इनका मिलाप गो ० विट्ठलनाथ से हुआ। इनसे दीक्षा  लेने के बाद  गोवर्द्धन पर्वत पर रहने लगे। आज भी वह स्थान ,जहाँ  थे  गोविंदस्वामी की कदंब खंडी   कहलाता  है। डा ० दीन दयाल गुप्त ने इनका  समय वि ० सं ० १५६२ के लगभग  मृत्यु वि ० सं ० १६४२ मानी है। (अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय ;पृष्ठ २६६-७२ )
            गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य होने के  पूर्व भी ये   एक  अच्छे गवैये थे और काव्य पाठ भी  करते थे। उस समय इनकी कविता का क्या विषय था यह ज्ञात नहीं है लेकिन विट्ठलनाथ  सम्पर्क में आने  के बाद इनकी कविता का मुख्य विषय  कृष्ण की सख्य और मधुर-लीला के पदों का  गान  हो गया।
     रचनाये :

    • स्फुट पद (प्रकाशन विद्या विभाग कांकरोली )
    माधुर्य भक्ति :
            गोविंदस्वामी ने आराध्य  रूप  में कृष्ण का स्मरण किया है। श्रीकृष्ण  परम रसिक  सुन्दरता  के मूर्तमान स्वरुप हैं। इनका अंग-प्रत्यंग कान्ति से दीप्त है उनकी छवि को देखकर चन्द्रमा आदि की ज्योति भी तुच्छ प्रतीत होती है:
                   कहो न परै हो रसिक कुँवर की  कुँवराई। 
                   कोटि मदन नख ज्योति ,विलोकत परसत नव इन्दु किरण की जुन्हाई।।
                   कंकण  वलय   हारगत   गत   मोती   देखियत   अंग  अंग   में वह झाई। 
                   सुघर  सुजान   स्वरुप   सुलक्षण   गोविन्द  प्रभु  सब  विधि सुन्दरताई।।(गोविन्दस्वामी :पद ४ २ ८ )
            गोविन्दस्वामी ने कृष्ण की मधुर लीलाओं में विशेष रूप से संयोग पक्ष की लीलाओं का ही वर्णन किया है। इसमें चीरहरण पनघट लीला ,रास,जल-विहार, सुरत आदि मुख्य हैं। इन संयोग लीलाओं का आरम्भ हास-परिहास  के  बीच अत्यधिक स्वाभाविक ढंग  से हुआ है। निम्न पद में एक ओर गोपियों में प्रथम संकोच का भाव लक्षित होता है और दूसरी ओर कृष्ण के प्रति आसक्ति का संकेत मिलता है :
                    क्यों निकसों इह खोरि सांकरी। 
                    नंदनंदन   ठाढ़े    मग    रोके   भारत   ताकि  उरोज    मांझरी।।
                    चंचल  नैन  उरज  अनियारे  तन  मन  देखियत  मदन छाकरी। 
                    जानि  न  दै  मुसकाइनु  लावत  आनि  देत  कर  टेकि लाकरी।।
                    बाँहि  मरोरि  दियो  मुख  चुम्बन हँसि हँसि दीनी पांइ  आंकरी। 
                    'गोविन्द 'प्रभु गिरधर मदनमोहन बदन विलोकत भई रांक री।(गोविन्दस्वामी ;पद ४५ )
             लोक-लाज वश गोपियाँ कृष्ण की इस छेड़-छाड़ का उलाहना लेकर यशोदा के पास पहुँचती हैं किन्तु वहाँ की स्थित देखकर ये चकित रह जाती हैं। अभी तक वे केवल कृष्ण की रूप माधुरी से परिचित थीं,पर यहाँ उनकी चतुराई के भी प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं :
                    बरजो  जसोमति  अपनों   लाल। जमुना तट ठाढ़ो करत आल।
                    मेरी       बाँह     मरोरी      तोरी। अरु कचुकी फारी परसि गाल।।
                    भरन  न   देत  जल श्री [गोपाल। मुख पर डालत लै जु  गुलाल।।
                    मेरे   माथे     पति   हैं    रिसाल। सास ननद मोहे करें जंजाल।।
                    सुनि चकित भए लोचन विसाल। बैठे    गोद     गोविंद    बाल।।(गोविन्दस्वामी ;पद १३६ )
           संभोग-सुख-हर्षिता गोपी की सुरतान्त छवि का सुन्दर परिचय हमें इस पद में मिलता है :
                    अति रसमति री तेरे नैन। 
                    दौरि दौरि जात निकट श्रवनन के हँसि मिलवत 
                    करि       कटाक्ष     कहत     रजनी  रति     बैन।।
                    लटपटी  चालि  अटपटी  बंदसि सगबगी अलक 
                    बदन  पर   विथुरी  अंग  अंग  प्रफुल्लित   मैन।  
                   गोविंद   बलि   सखी  कहै  मैं   तो  तब ही लखी 
                    मेरे     जिय     तब     ही      ते    सुख     चैन ।।(गोविन्दस्वामी ;पद ४६५ )
           वियोग पक्ष में पूर्वानुराग के पदों के अतिरिक्त दो चार पदों में गोविन्दस्वामी ने राधा के मान का भी सुन्दर वर्णन किया है :
                    सुनि री स्यामा चतुर सयानी। 
                    गिरधर पिय तव विरह विकल भए कौन बात तैं ठानी।।
                    राधे  राधे  जपत  कुंजनि  में  करति  बात   एक छानी।
                    ऐसो   समय  फेरि  नहिं  पावै  कहति  हौं   तेरी बानी।।
                    रसिक  राइ   वे  त्रिभुवननाइक   मिलिहौं  जाइ आनी। 
                    'गोविंद 'प्रभु पिय पे जु चली उठि कीनी जो मनमानी।।(गोविन्दस्वामी ;पद ४८८ )

    साभार स्रोत:

    • हिंदी साहित्य का इतिहास :आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
    • अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय:डॉ दीनदयाल गुप्त 
    • गोविन्दस्वामी पद संग्रह :प्रकाशन :विद्या विभाग कांकरोली


    शुक्रवार, 2 जून 2017

    चतुर्भुजदास

    By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                  अशर्फी लाल मिश्र 

    जीवन परिचय :
                चतुर्भुजदास की वल्लभ सम्प्रदाय के भक्त कवियों में गणना की जाती है ये कुम्भनदास के पुत्र और गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य थे। डा ०  दीन  दयाल गुप्त के अनुसार इनका जन्म वि ० सं ० १५९७ और  मृत्यु वि ० सं ० १६४२ में हुई थी। (अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय ;पृष्ठ २६५-२६६ ) इनका जन्म जमुनावती गांव में गौरवा  क्षत्रिय  कुल में हुआ था। वार्ता के अनुसार ये स्वभाव से साधु और प्रकृति से सरल थे। इनकी रूचि भक्ति में आरम्भ से ही थी। अतः भक्ति भावना की इस तीव्रता के कारण श्रीनाथ जी के अन्तरंग  सखा बनने का सम्मान प्राप्त कर सके।

    रचनाएँ :
     आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने  अपने साहित्य के इतिहास के ग्रन्थ में निम्न रचनाओं का उल्लेख किया है :

    • द्वादश यश 
    • हित जू को मंगल 
    • भक्ति प्रकाश 
    इसके अतिरिक्त कुछ स्फुट पद। 

    माधुर्य भक्ति :
              चतुर्भुजदास के आराध्य नन्दनन्दन श्रीकृष्ण हैं। रूप, गुण  और प्रेम सभी दृष्टियों से ये भक्त का मनोरंजन करने वाले हैं। इनकी रमणीयता भी विचित्र है ,नित्यप्रति  उसे देखिये तो उसमें नित्य नवीनता दिखाई देगी ;
                         माई री आज और काल्ह और ,
                        दिन प्रति और,देखिये रसिक  गिरिराजबरन। 
                        दिन  प्रति   नई   छवि  बरणै   सो कौन कवि ,
                        नित      ही    श्रृंगार     बागे     बरत     बरन।।
                        शोभासिन्धु  श्याम अंग  छवि  के  उठत तरंग ,
                        लाजत  कौटिक  अनंग   विश्व  को   मनहरन। 
                        चतुर्भुज   प्रभु     श्री    गिरधारी     को    स्वरुप ,
                       सुधा पान कीजिये जीजिए रहिये सदा ही सरन।। 
               
              प्रेम के क्षेत्र में भक्तों के लिए आदर्श गोपियाँ भी श्रीकृष्ण की रूप माधुरी से मुग्ध हैं। उसकी सुन्दर छवि को देखकर गोपियों का तन मन सभी कुछ पराया हो जाता है वे सदा श्रीकृष्ण के दर्शन करना चाहती हैं। इसी से उनके  मन का संताप दूर होता है। श्रीकृष्ण से वे लोक- लाज ,कुल के  नियम एवं बन्धन सब तोड़कर मिलना चाती हैं :
                      तब ते और न कछु सुहाय। 
                      सुन्दर  श्याम जबहिं  ते देखे  खरिक दुहावत गाय।।
                      आवति हुति चली मारग सखि, हौं अपने सति भाय। 
                       मदन   गोपाल  देखि कै इकटक रही ठगी मुरझाय।।
                       बिखरी    लोक  लाज   यह   काजर   बंधु  अरु भाय। 
                       दास चतुर्भुज प्रभु गिरिवरधर तन मन लियो चुराय।। 
             गोपियों के मन को वश में करने में कृष्ण की रूप माधुरी के साथ- साथ उनके गुण तथा मुरली माधुरी का भी पूर्ण प्रभाव पड़ता है। उनकी मुरली माधुरी का भी पूर्ण प्रभाव पड़ता है।  मुरली माधुरी तो चेतन-अचेतन सभी को अपनी तान से मुग्ध कर देती है। अतः बन में जाती हुई गोपी के कान में पहुँचकर सप्त-स्वर बंधान युक्त मुरली की ध्वनि यदि अपना प्रभाव डालती हो तो आश्चर्य क्या :
                         बेनु धरयो कर गोविन्द गुन निधान। 
                        जाति हुति बन काज सखिन संग ठगी धुनि सुनि कान।।
                         मोहन सहस कल खग मृग पसु बहु बिधि सप्तक सुर बंधान। 
                         चतुर्भुजदास प्रभु गिरिधर तन मन चोरि लियो करि मधुर गान।।
             इस प्रकार श्रीकृष्ण की रूप माधुरी और मुरली माधुरी से हरितमना गोपी की दशा का चित्रण चतुर्भुजदास ने बहुत सुन्दर दंग से निम्न पद में किया है :
                          ठाढ़ी एक बात सुनि धीरी धीरी। 
                          भोरहि ते कहा  मटुकी  लिए  डोलति   ब्रज  बासिनी अहीरी।।
                          माधो  माधो  कहि कहि टेरत बिसर गयो तोहि नाम दही री। 
                           न   जानों  कहुँ   मिले   श्यामघन  यह  रट  लागि  रही  री।। 
                          मोहन  मूरति मन हर लीनो नहिं समुझत कहु काहू कही री। 
                           चतुर्भुजदास   विरह   गिरधर  के  सब  बन  फिरत बही  री।।  
               चतुर्भुजदास ने कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का वर्णन विविध रूपों में किया है। उसमें संयोग की आह्लादकता और वियोग की तड़पन दोनों का वर्णन आ गया है। संयोग पक्ष की लीलाओं  में वन-विहार ,झूलन ,सुरतान्त-छवि तथा  रति का वर्णन मुख्य रूप से किया गया है। रति-वर्णन में कवि ने उचित मर्यादा का पालन किया है। अतः विहार-वर्णन में स्पष्टता की अपेक्षा सांकेतिकता अधिक है :
                           पौढ़े प्यारी राधिका के संग। 
                           नव किशोर और नव किशोरी गौर श्यामल अंग।।
                            स्वच्छ सेज सुगन्ध सीतल रत्नजटित पर्यंक। 
                            दशन खण्डित बदन बीरे भरे रति रस-रंग।।
                            उपजी चतुर्भुजदास दुहूँ दिशि प्रेम सिन्धु तरंग। 
                            रसिकनी अरु रसिक गिरधर मुदित जीत अनंग।।
    साभार स्रोत :

    • अष्टछाप और वल्लभ सम्प्रदाय ;डॉ दीनदयाल गुप्त 
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
    • हिन्दी साहित्य का इतिहास : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
    • हिन्दी साहित्य :आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी 


                       

    गुरुवार, 1 जून 2017

    नन्ददास

    By : अशर्फी लाल मिश्र
                                                                   अशर्फी लाल मिश्र 

    परिचय : 
           नन्ददास की गणना वल्लभ सम्प्रदाय के प्रमुख भक्त कवियों में की जाती है। ये गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य थे। इनका जन्म सनाढ्य ब्राह्मण कुल में वि ० सं ० १५९० में हुआ। (अष्टछाप और वल्लभ :डा ० दीनदयाल गुप्त :पृष्ठ २५६-२६१ ) ये संस्कृत और बृजभाषा के अच्छे विद्वान थे। भागवत की रासपंचाध्यायी का भाषानुवाद इस बात की पुष्टि करता है। वैषणवों की वार्ता से पता चलता है कि ये रसिक किन्तु दृढ़ संकल्प से युक्त थे। एक बार ये द्वारका की यात्रा पर गए और वहाँ से लौटते समय ये एक क्षत्राणी के रूप पर मोहित हो गये। लोक निन्दा की तनिक भी परवाह न करके ये नित्य  उसके दर्शनों के लिए जाते थे। एक दिन उसी क्षत्राणी के पीछे-पीछे आप गोकुल पहुँचे। इसी बीच वि ० सं ० १६१६ में आपने गोस्वामी विट्ठलनाथ दीक्षा ग्रहण की और तदुपरान्त वहीं रहने लगे। डा०  दीनदयाल गुप्त के अनुसार इनका मृत्यु-संवत १६३९ है।
            वार्ता  के अनुसार नन्ददास गोस्वामी तुलसीदास के छोटे भाई थे। विद्वानों के अनुसार वार्ताएं बहुत बाद में लिखी गई हैं। ( हिन्दी साहित्य का इतिहास :आचार्य रामचन्द्र शुक्ल :पृष्ठ १७४ ) अतः इनके आधार पर सर्वसम्मत निर्णय नहीं हो  सकता। पर इतना निश्चित है कि जिस समय  वार्ताएं लिखी गई होंगी  उस समय यह जनश्रुति रही होगी कि नन्ददास तुलसीदास  भाई हैं चाहे चचेरे हों ( हिन्दी साहित्य :डा ० हजारी प्रसाद द्विवेदी :पृष्ठ१८८ )या गुरुभाई ( हिन्दी सा० का इति० :रामचंद्र शुक्ल :पृष्ठ १२४ ) बहुत प्रचलित रही होगी।

    रचनाएँ :
    • रास पंचाध्यायी 
    • सिद्धान्त पंचाध्यायी 
    • अनेकार्थ मंजरी 
    • मान मंजरी 
    • रूप मंजरी 
    • रस मंजरी 
    • विरह मंजरी 
    • भँवर गीत 
    • गोवर्धन लीला 
    • स्याम  सगाई 
    • रुक्मिणी मंगल 
    • सुदामा चरित 
    • भाषा दशमस्कन्ध 
    • पदावली 
    माधुर्य भक्ति :
              नन्ददास के   कृष्ण सर्वात्मा हैं ,सब  एक मात्र गति हैं अतः प्रत्येक व्यक्ति उन्हीं से प्रेम सम्बन्ध स्थापित करना चाहता है। यह  वही ब्रह्म है जिसके विषय में वेद नेति नेति   कहते हैं और इस प्रकार उन्हें अगम बताने की चेष्टा करते हैं। परन्तु इनकी विशेषतः यह है कि यह अगम होते हुए भी प्रेम से सुगम हैं:
                            जदपि अगम ते अगम अति ,निगम कहत है जाहि। 
                           तदपि   रंगीले  प्रेम  ते,  निपट  निकट  प्रभु  आहि।।  (रूप मंजरी :पद ५१४ )
              इसीलिए कवि इनकी अगम,अनादि,अनन्त ,अबोध आदि नकार अथच नीरस शब्दों में स्तुति नहीं करता ,वरन उसके लिए कृष्ण सुन्दर आनन्दघन ,रसमय ,रसकारण और स्वयं रसिक हैं। ऐसे ही कृष्ण उसके आराध्य हैं और उसकी प्रेमाभक्ति के आलम्बन हैं। राधा इन्हीं रसमय कृष्ण की प्रिया हैं। कवि के शब्दों में ~~ 
                            
                            दूलह गिरधर लाल छबीलो दुलहिन राधा गोरी। 
                            जिन देखी मन में अति लाजी ऐसी बनी यह जोड़ी।।(पदावली :पद ६० )
              राधा और कृष्ण एकान्त में ही स्वयं दूल्हा-दुलहिन नहीं  हैं। नन्ददास ने स्याम सगाई नामक ग्रन्थ में वर-वधू दोनों पक्षों की सम्मति दिखाकर राधा के साथ कृष्ण की सगाई कराई है। सगाई के बाद जो उत्सव की धूम हिन्दू घरों की एक विशेषता  है ,उसका भी सुन्दर परिचय  कवि ने दिया है ~~ 
                           सुनत  सगाई  श्याम ग्वाल सब अंगनि फूले,
                           नाचत   गावत   चले,  प्रेम  रस  में  अनुकूले। 
                           जसुमति रानी घर सज्यो ,मोतिन चौक पुराइ,
                           बजति  बधाई  नन्द  के  नन्ददास  बलि जाइ।। (स्याम सगाई :पृष्ठ २७ )
              राधा के अतिरिक्त कृष्ण अपने सौन्दर्य और रसिकता के कारण गोपियों के भी प्रियतम बन जाते हैं। श्यामसुन्दर के सुन्दर मुख को देखकर वे मुग्ध हो जाती हैं और कभी-कभी सतत दर्शनों में बाधा -रूप अपनी पलकों को कोसती हैं ~~~ 
                           देखन दे मेरी बैरन पलकें। 
                           नंदनंदन  मुख  तें  आलि बीच  परत  मानों बज्र  की  सल्काइन।।
                           बन   तें  आवत  बेनु   बजावत  गो -रज  मंडित  राजत   अलकैं। 
                           कानन कुंडल चलत अंगुरि दल ललित कपोलन में कछु झलकें।।
                           ऐसी  मुख `निरखन  को   आली  कौन  रची बिच पूत कमल कैं। 
                           'नन्ददास 'सब जड़न की इहि गति मीन मरत भायें नहिं जलकेँ।।(नन्ददास ग्रन्थावली :सं ० ब्रजरत्नदास :पदावली ७९ )

               सभी गोपियों का कृष्ण-चरणों में अनन्य प्रेम है। श्रीकृष्ण के लिए उन्होंने लोक-लाज ,कुल-मर्यादा  सभी का परित्याग कर दिया है। श्रीकृष्ण ही उनके सर्वस्व हैं। उन्हीं की प्रसन्नता के  लिए वे सब कुछ करती हैं और उसके फलस्वरूप उन्हें किसी वस्तु की चाह नहीं है। इसीलिए 'भँवर गीत ; के आरम्भ में उनका   परिचय  देते हुए नन्ददास ने कहा है :  
                          ऊधौ    को     उपदेश   सुनो      ब्रज-नागरी। 
                          रूप,  सील ,  लावन्य     सबै   गुन   आगरी।।
                          प्रेम-धुजा ,रस-रूपिनी ,उपजावनि  सुख पुंज। 
                          सुन्दर स्याम-विलासिनी ,नव वृन्दावन कुंज।। (भँवरगीत :पद १ )
             निजी सुख की कामना के आभाव के कारण गोपियों का प्रेम नितान्त शुद्ध है। उनके इस प्रेम का   परिचय हमें तब मिलता है जब उद्धव से कृष्ण का नाम सुनते ही उनकी आँखों में अश्रु बहने लगते हैं ,उनका कंठ अवरुद्ध हो जाता हैऔर उन्हें रोमांच हो जाता है :
                           सुनत स्याम को नाम बाम गृह की सुधि भूली। 
                           भरि  आनन्द रस  ह्रदय  प्रेम बेली द्रुम फूली।।
                           पुलक रोम सब अंग भये भरि आये जल नैन।       
                           कंठ   घुटे गदगद  गिरा  बोल्यो  जात न बैन।।(भँवरगीत :पद ३ )
              गोपी-कृष्ण की संयोग पक्ष की मधुर-लीलाओं में नन्ददास ने मुख्य रूप से दान-लीला ,रास-लीला ,झूलन,फ़ाग और विहार का वर्णन किया है। इस वर्णन में उनकी कवित्व शक्ति का अच्छा परिचय मिल जाता है। रास के इस वर्णन में गोप-युवतियों और कृष्ण की रूप-छवि का अत्यधिक सरस् और प्रांजल भाषा में वर्णन किया है :
                        खेलत रास रसिक रस-सागर। 
                         मंडित  नव   नागरी  निकर  बर  परम  रूप  को आगर।।
                         विकच  बदन  बनिता  बृंद अतिसै अमल  सरद  राजत। 
                        राका   सुभग  सरोवर   में  जस  फूले   कमल विराजत।।
                        नवकिसोर  सुन्दर साँवर अंग बलित ललित ब्रजबाला। 
                        मानों  कंचन   खचित  नील मनि  मंजुल पहिरी माला।।
                        या  छवि   की   उपमा   कहिबे   को  ऐसो कौन पढ्यो है। 
                        'नन्ददास 'प्रभु को कौतुक लखि कामहि काम बढ्यो है।(पदावली ;पद १२० )
            
    साभार स्रोत :

    • हिन्दी साहित्य :डा ० हजारी प्रसाद द्विवेदी 
    • हिन्दी सा० का इति० :रामचंद्र शुक्ल
    • ब्रजभाषा के कृष्ण- काव्य में माधुर्य भक्ति :डॉ रूपनारायण:हिन्दी अनुसन्धान परिषद् दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली के निमित्त :नवयुग प्रकाशन दिल्ली -७ 
    • अष्टछाप और वल्लभ :डा ० दीनदयाल गुप्त 
    • नन्ददास ग्रन्थावली :सं ० ब्रजरत्नदास
    • भँवर गीत 
    • रूप मंजरी 



    भार्गव राम (खण्डकाव्य)-अशर्फी लाल मिश्र

     लेखक : अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर,कानपुर।© अशर्फी लाल मिश्र (1943-----) भार्गव राम (परशुराम ) अनुक्रमणिका :  1-  भार्गव राम - 1 2 -  भार्गव ...